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समझो, तो सबक सबके लिए

समझो, तो सबक सबके लिए
दिल्ली विधानसभा चुनाव 2015 के नतीजों का सबक जितना हारने वालों के लिए है, उतना ही जीतने वालों के लिए भी। यह लोकतंत्र में जनता के असली 'राजा' होने का वह सबक है, जिसे सत्ता, पैसे और ताकत के दंभ में अकसर हमारे राजनीतिबाज भूलते रहे हैं, और अपनी हर जीत का श्रेय मन ही मन अपनी चालबाजियों को देकर विरोधियों की कमजोरी को नकारते रहे हैं.

हर जीतने वाला इस गलतफहमी का शिकार होता है कि वह कभी हारेगा नहीं. वह इतना काबिल है कि जनता ने उसे उसकी योग्यता के चलते चुना, न कि विरोधी की कमजोरियों व उसके झूठे अहंकार से चिढ़ कर चुना. जीतने वाला यह भी नहीं सोचता कि भ्रामक प्रचार, पैसे और बाहुबल के गलत प्रयोग से पाई गई सत्ता की कलई बदलते वक्त के साथ इस कदर रंगहीन हो जाती है कि कोई नामलेवा भी नहीं बचता...कांग्रेस का हश्र सामने है, पर फिलहाल बात उनकी, जिन्हें दिग्विजयी होने का दंभ हो गया था. कौन हैं ये, सभी जानते हैं उन्हें.
 
दरअसल, हमारे राजनीतिबाज बहुत जल्दी हर 'जीत' के साथ अपनी जमीनी हकीकत भूल जाते हैं. वह हार-जीत के असली कारणों की तलाश करने की जगह, धन व चमचों के प्रभाव में वास्तविकता को स्वीकार नहीं कर पाते. यह सच है कि आज की राजनीति के लिए पैसा जरूरी है, प्रचार और मीडिया भी जरूरी है, पर सिर्फ कोई पैसा, सिर्फ कोई प्रचार, और सिर्फ कोई मीडिया किसी को नेता, किसी को जननायक बना देता, तो न तो कभी कांग्रेस हारती, न ही अब भाजपा की पूरी जमात मोदी जैसे चेहरे के बावजूद इस कदर धूल धुसरित होती।

दुख तो यह है कि हमारे नेताओं पर अहंकार इस कदर हावी हो गया है कि वे सच्चाई देखने को राजी नहीं होते। तब भी जब वे हारते हैं, और तब भी जब वे जीतते हैं. अफसोस कि हाल में राजनीति के इस घटिया खेल में नेताओं के अहंकार को फुलाने में स्वार्थी पूंजीपतियों और दलालों के साथ मीडिया ने भी बड़ी भूमिका निभाई है। मीडिया के हमारे साथी सच बताने और लिखने से कतराते हैं। अगर कतराते नहीं, तो या तो फिर वे मूर्ख हैं, या परले दर्जे के स्वार्थी।

दिल्ली की राजनीति का क, ख, ग जानने वाले को भी यह पता था कि विधान-सभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अहंकार, अमित शाह की नासमझी और संघ के असहयोग की कीमत भाजपा को चुकानी ही होगी। रही-सही कसर किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का नेता घोषित कर खुद भाजपाइयों ने पूरी कर ली। 
 
मीडिया के कितने साथियों या फिर भाजपा के कितने नेताओं ने प्रधानमंत्री को यह बताया कि- साहेब, आपके चमचों द्वारा गढ़ी गई आप की कथित जननायक वाली छवि अब उस अति तक पहुंच चुकी है कि आपके साथ-साथ पार्टी का भी नुकसान कर रही है. या फिर लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत का श्रेय भले ही आपके पिछ्लग्गू आपकी छवि और अमित शाह की जुगलबंदी और प्रबंधन को दे रहे हैं, पर यह अर्ध-सत्य है. सच्चाई न बताकर  वे आपको गुमराह कर रहे हैं, इससे न केवल वे आपका कल, आपका नाम, बल्कि आपकी पार्टी और अंतत: देश का नुकसान कर रहे हैं.

कितनों ने मोदी जी को बताया कि साहेब! लोकसभा चुनाव आप जीते थे जरूर, भाजपा भी जीती थी, पर आप न होते तो भी भाजपा जीतती, क्योंकि कांग्रेस को हारना था। कांग्रेस की नाकामियों, उसके नेताओं द्वारा जनता की अनदेखी, शासक दल के अहंकार से उसे डूबना ही था. आप की जगह कोई और भी होता तब भी वह डूबती ही डूबती. पर जनता के इस फैसले को समझने की जगह चुनाव जीतते ही आप खुद भी उसी राह पर चल पड़े.

सिर्फ जुमलों से, कुछ पूंजीपतियों से, चाटुकारों की कोटरी से आप ने देश को शहंशाह वाले अन्दाज में चलाना शुरू कर दिया। जनता गायब हो गई, समर्पित कार्यकर्ताओं की जगह चाटुकारों ने ले ली. पार्टी कैडर निराश होने लगा और जनता....उसे तो आपने समझा था कि नारों, वादों और पोस्टरों भर से मैनेज हो जाएगी, जैसे पहले मैनेज हुई थी. पर जनाब ऐसा था नहीं, पहले वह कांग्रेस से नाराज हुई थी, इसी दिल्ली में 'आप' से भी हुई थी, और अबकी उसने आपको, आपकी पार्टी सहित लपेट दिया...यही गलतफहमी, ऐसी ही गलतफहमी कभी कांग्रेस को हुई थी, यही आपको भी हुई और नतीजा सामने है। 
 
जिस जनता ने ब्रिटिश साम्राज्य को खदेडा, जिसने कांग्रेस को उसकी जगह दिखाई, उसे भला मैनेज करके, जुमलों और धनबल से ही केवल कैसे जीता जा सकता है? वह भला आपका अहंकार कैसे झेलेगी, और क्यों झेलेगी? ऐसा नहीं है कि आम आदमी पार्टी ने कभी कोई गलती नहीं की, या वे केवल अपनी काबिलियत से जीते या फिर अरविंद केजरीवाल में कोई अहंकार नहीं है। आम आदमी पार्टी में भी खामियां हैं, कमी अरविंद केजरीवाल में भी है, पर वह इसे मानने और सुनने, समझने को तैयार हैं।

अरविंद जी और उनकी टीम ने पिछले 3 महीने तक दिल्ली की हर गली, हर महल्ले में जाकर जन-जन से, घर-घर में माफी मांगी. लोगों से कहा वह पिछले साल के अपने व्यवहार के लिए शर्मिन्दा हैं, आपकी सेवा करना चाहते हैं, आपके बीच के ही हैं, आपके साथ ही रहेंगे। जनता को उनकी बातों में सच्चाई लगी. उसने उन्हें ध्यान से सुना, समझा और उसे लगा कि इस आदमी को चुनना चाहिए, यह वाकई नेता नहीं सेवक है, यह कम से कम उनसे तो अलग है, जो अपने को प्रधान सेवक सिर्फ कहते भर हैं, बाकी तेवर शहंशाहों के हैं, ठाट, कपड़े यहां तक की बातचीत में भी। 
 
हार के बाद अब चाहे भाजपा के नेता कुछ भी कहें, पर सच यही है कि इस चुनाव को 'मोदी बनाम केजरीवाल' खुद भाजपा, अमित शाह और मोदी ने बनाया था, जिसमें मोदी और भाजपा की बुरी तरह हार हुई है। यह केवल भाजपा या मोदी की नहीं, उनकी नीतियों, उनके अहंकार, उनके पूंजीपति दोस्तों, सलाहकारों और रणनीति बनाने वाली उस पूरी टीम की हार है, जो धरातल से उपर उठ चुकी थी।

शर्मनाक तो यह कि देश की सर्वाधिक प्रतिष्ठित पुरानी पार्टी कांग्रेस तो जिक्र के लायक भी नहीं बची है। लोकतंत्र में जनता की इसी ताकत को नेताओं को पहचानना होगा। बचेगा वही, जो जनता का होगा, जनता के लिए होगा, उनके बीच का होगा। चाहे वह राहुल बाबा हों, मोदी-अमित शाह हों या फिर जीत के रथ पर वापसी करने वाले केजरीवाल.

फिलहाल 'आप', अरविन्द केजरीवाल और उनकी पूरी टीम को दिल्ली की ऐतिहासिक जीत पर बधाई. जय हो जनता जनार्दन की! 
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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