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सोचें! ताकि बची रहे इनसानियत

सोचें! ताकि बची रहे इनसानियत साल आते हैं और जाते हैं. आएंगे भी, और जाएंगे भी. क्योंकि इनका आना और जाना एक क्रम भर है. प्रतीक भर है, जीवंतता का, निरंतरता का. फिर हम इन्हें गिनते क्यों हैं? आने वाले का स्वागत और जाने वाले का लेखा-जोखा क्यों करते हैं? यह जानते हुए भी कि जो बीत गया उसे लौटना नहीं है, और जो आ रहा, उसे हम जानते नहीं! वैसे भी जिसे हम 'साल' कहते हैं, वह तो केवल एक इकाई भर है 'समय' की. ठीक उसी तरह जैसे गिना जाता है, सेकंड, मिनट, घंटा, दिन, हफ्ता, पखवारा, महीना, तिमाही, छ्माही और फिर साल... यह गिनती लंबी हो सकती है, दशक, अर्धसदी, काल-खंड, युग और युगाब्द में.

पर समय की इस गिनती में हमारी भूमिका कितनी है, कितने काल की? कितने सेकंड, मिनट, घंटे, महीने या फिर कितने सालों की? जीवन की आपाधापी में हम शायद इसे सोचते नहीं. क्योंकि जब हम पैदा होते हैं, तो समय का मान करने की इतनी समझ नहीं होती. बचपन और किशोरावस्था का कहना ही क्या, बहता पानी, रोक-टोक अर्थहीन, बस आवेग और प्रवाह! फिर युवावस्था. जब युवा होते हैं, तो जोश और एनर्जी हमें सोचने नहीं देती, और ढलती उम्र में वक्त ही उतना नहीं बचता. शरीर, तन-मन, उर्जा, सब अस्ताचल की तरफ होते हैं, साथ छोड़ने से लगते हैं. बिल्कुल ' तीसरी कसम' फिल्म के ' सजन रे झूठ मत बोलो' गीत के इन पंक्तियों की तरह, 'लड़कपन खेल में बीता, जवानी नींद भर सोया, बुढ़ापा देखकर रोया....'

पर मान लीजिए कि हम समय के इस 'मान' को गिन ही न रहे होते तो? तो क्या होता, क्या यह घटता नहीं, जो घट रहा है हमारे इर्द-गिर्द, हमारे जीवन में, हमारे आसपास, हमारे देश, समाज, मित्रमंडली और दुनिया भर में? घटता, जरूर घटता. बिल्कुल हमारी सांसों की तरह, दिल की धड़कनों की तरह, जिसे हम गिनते नहीं, गिन भी नहीं सकते, पर जिनका होना ही हमारे 'वजूद' की, हमारे 'जीवन' की, हमारे 'होने' की गवाही है. पर अगर हम सांसों और धड़कनों की तरह ही 'समय' और गुजरे साल को गिन नहीं रहे होते, जो घट रहा है उसे पहचानने, समझने, सुधारने और उन पर अमल करने की समझ नहीं रख रहे होते, कि क्या हुआ, क्या होना चाहिए और क्या होता तो अच्छा था, हम सबके लिए, तो फिर हममें और जानवरों में कोई फर्क ही नहीं बचता.

मौत के आने तक जीते तो पशु-पक्षी भी हैं, दिल उनका भी धड़कता है और सांसें उनकी भी चलती हैं, पर उनमें व हममें जो फर्क है, वह है विवेक का, संवेदना का, समझ का, सच और झूठ की परख का, मानवता का, भावुकता का...वरना तो वह हर जीव, जो इस धरा पर जनमा है, जी रहा है,  खाता है, पीता है, सुनता है, बोलता है, चलता है, फिरता है, सेक्स और प्रजनन करता है. इनमें से कई सारे तो बाकायदा सामाजिक भी हैं, समूहों में भी रहते हैं, तो कइयों के बीच परिवार नामक इकाई भी बाकायदा मौजूद है.

...इसीलिए जब हम जब बीतने वाले कल का लेखा-जोखा करने बैठते हैं, तो यह पाते हैं कि बीते कुछेक सालों में आधुनिकता और तकनीक के प्रभाव ने इनसान को तरक्की के नाम पर जानवर से भी बदतर बना दिया है. सभ्यता की, सहजता की तो छोड़िए, हम तो 'जड़', 'असहज' और 'संवेदनहीन' होते जा रहे हैं. संचार और सूचनाओं के विस्फोट ने 'इनसान' से जो सबसे बड़ी चीज छीनी है, वह है उसकी संवेदना, उसकी इनसानियत, उसकी मानवता, उसकी करुणा  और उसके आदमजात होने का गुण.

बीते साल 2014 में यह खामी कुछ ज्यादा शिद्दत से दिखी. देश के अंदर भी और देश के बाहर भी. अफसोस कि इनसानी गिरावट के इस दौर से शायद ही कोई देश बचा हो. अमेरिका में रंगभेद के नाम पर खून-खराबा और विकास के नाम पर नग्नता अपने अगले चरण में है, तो भूमि विस्तार की रूस की महत्त्वाकांक्षा हजारों जानें लेने के बाद भी तृप्त नहीं हुई है. खाड़ी देशों में जो हो रहा वह छिपा नहीं है. आलम यह है कि अपना काम कर रहे निहत्थे लोगों को मजहबी उन्माद के नाम पर पकड़ कर उनकी कटी हुई गरदनों के साथ नकाबपोश आतंकियों की फोटुएं धमकी के तौर पर जारी की जा रही हैं. चीन, उत्तर कोरिया, आस्ट्रेलिया सब आतंक के शिकार हुए, हो रहे हैं अलग-अलग ढंग से.

भारतीय उप-महाद्वीप का तो कहना ही क्या? भारत में लोकतंत्र की विजय इस रूप में दिखी कि पहली बार नरेंद्र मोदी की अगुआई में भगवा दल ने न केवल दिल्ली में केंद्र की सत्ता हथियाई बल्कि बाद में हुए राज्यों के भी सारे के सारे चुनाव जीत लिए. सियासत के अलावा देश ने मंगल पर मंगलयान भेज लिया, तो संचार और सुरक्षा के हलके में नई कामयाबी हासिल की. पर इन सबके बीच आम आदमी की मुश्किलें हल करने की दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हुई. केवल नाम और नारों से काम चलाया जा रहा है.

देश में नक्सली समस्या बदस्तूर कायम है. पर चिंता धर्म की हो रही है. हिंसा भी उसी के नाम पर सबसे ज्यादा है. इसी तरह योजना आयोग को हटा कर अब नीति आयोग बन रहा, जिससे आम आदमी का क्या भला होगा पता नहीं, पर लक्ष्य साफ है, लूट के हिस्से में नए एजेंटों की भागीदारी बराबरी की हो. तय है इस व्यवस्था से अमीर और अमीर, गरीब और गरीब बनने की राह पर है. पड़ोसी पाकिस्तान में तालिबानी बहशीयत ने शैतानियत को भी पीछे छोड़ दिया. इस बार उनके निशाने पर थे, मासूम बच्चे, जिनके जीवन के फूल अभी खिले ही नहीं थे. हम भगवान से होड़ लेने का दंभ भरते हैं पर समय पर अपनी कोई पकड़ नहीं. इसी धरती पर आसमान से जहाज गायब हो जा रहे, हम उन्हें ढूंढ नहीं पा रहे. फिर गरीबी, भूखमरी, बीमारी की चुनौतियां तो जस की तस हैं ही.  

ऐसे में यह तरक्की किस काम की, जिसमें इनसानियत, संवेदना, सेवा और मदद का भाव न हो? हमारे कुछ साथियों को सड़क के लोगों का दुख तो दिखता है, पर उन्हें अपने आसपास के लोगों की भावनाओं का पता नहीं चलता, क्योंकि समृद्धि और तकनीक ने शायद उनके अच्छे गुणों को ग्रहण लगा दिया है. वह वे नहीं देख पा रहे, जो उन्हें देखना चाहिए. शायद हमारे समाज में शिक्षा की दिशा ही बदल गई है. पैसा और तत्कालिक सफलता ही आज के समय का सबसे बड़ा सच हो गया है, पर बदलते 'वक्त' में यह सब भी क्षणिक है, इसे सोचने की जहमत भला कौन उठाए.

सच तो यह है कि तथाकथित अमीरी ने इनसान को मानवता के लेवल पर और गरीब कर दिया है. जीवन में 'कर्म' से ज्यादा 'प्रोपेगंडा' की भूमिका हो गई है, दिमाग पर 'कर्तव्य' से ज्यादा 'अधिकार' हावी हो गया है, और 'मन'... मन में क्या कुछ भर रहा, समझना दूभर है. आलम यह है कि कुछ लोगों को भावुकता में मूर्खता दिखती है और कुछ इसकी तुलना क्रूरता से करने लगे हैं, तो कुछ को इनसानी जीवन, गतिविधियों और रिश्तों की आपसी तुलना पशु-पक्षियों से करने में मजा आने लगा है. कोई कभी इनसान के तर्क करने की क्षमता की तुलना कबूतर के साथ शतरंज खेलने से करने में लगा है, तो किसी को इनसानी दिमाग और उसके कठिन श्रम की तुलना में 'गधे और शेर' का उद्धरण याद आ रहा कि श्रम करने से कोई राजा बनता तो जंगल का राजा गधा होता, आलसी शेर नहीं.

अब ऐसा करने वाले हमारे अजीज लोगों को कौन समझाए कि आदरणीय! पशु- पक्षी तो अपनी प्रजाति से बाहर कर्म कर ही नहीं सकते, इसमें उनका कोई दोष नहीं, इस धरा पर सिर्फ इनसान ही एक ऐसा जीव है, जो अपने कर्मों से अपना कल लिखता है, अपनी कृति से संवारता है न केवल खुद को, बल्कि गढ़ता है समाज को, बुनता है सभ्यता को और रचता है संस्कृति को. वह जाना ही जाता है अपने कर्मों से. इसलिए अगर आप भाग्यशाली हैं कि बिना श्रम किए आपको सब कुछ हासिल हो जा रहा, तो उपरवाले को धन्यवाद दें, उदार हों, दूसरों के श्रम का मजाक तो न उड़ाएं.

धनवान और भाग्यशाली होना अच्छी बात है, पर इनसानी श्रम का मजाक उड़ाना या उसकी तुलना जानवर से करना कहां की समझदारी. फिर अगर आप 'इनसान और जानवर' का अंतर समझने को राजी नहीं, तो आपके लिए हमारे जैसे लोग सिर्फ प्रार्थना ही कर सकते हैं. सन्मति सबमें उपजे. उनमें भी जो इनसे वंचित हैं. चाहे हमारे अपने हों या पराए. सच तो यह है कि इस प्रकृति में इनसान नाम के 'जीव' ने अपने बौद्धिक होने, ताकतवर होने और विवेकशील होने का जितना गलत इस्तेमाल अपने स्वार्थ के लिए किया है, उतना किसी भी दूसरे ' जीव' या 'जानवर' ने नहीं किया. धरा, आसमान सबका दोहन हम अपने स्वार्थ के लिए कर रहे. बस एक सामाजिकता और संवेदनशीलता बची थी, धीरे-धीरे वह भी खतरे में है.  

होना तो यह चाहिए था कि हर बदलने वाले दिन के साथ इनसान अपनी बेहतरी की तरफ कदम बढ़ाता, पर हो इसका उलटा रहा है. 'वसुधैव कुटुम्बकम' का दर्शन मानने वाले देश के नागरिक अब मानव मात्र और सम्पूर्ण विश्व तो दूर, अपने देश, शहर, गांव, समाज, कुटुम्ब, मित्र, पड़ोसी और अपने परिवार तक की नहीं सोच रहे. परिवार का अर्थ बहुतों के लिए अब 'हम दो- हमारे दो' के बीच से होता हुआ 'मी' और 'माइसेल्फ' तक सिमट चुका है. 2015 हमारी इस संकीर्ण सोच को बदले, हमारे दिलों को बड़ा करे. जिसमें अपने और हमारे अलावा कुछ और भी समा सकें, आमीन!
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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