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बदलाव की दिशा में...

बदलाव की दिशा में... वक्त बदल रहा है, पर इतनी तेजी से भी नहीं कि उससे तालमेल न बिठाया जा सके. कम से कम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देख कर तो यही लग रहा है. मोदी एक साथ इंटरनेट पर ट्‌वीटर व फेसबुक और बिल्डिंगों व सडक पर झाडू, को साधने में लगे हैं.

टीवी खबरों और अखबारों की सुर्खियां देखें तो 'क्लीन इंडिया' का उनका नारा, अब केवल नारा भर नहीं रह गया है. दिखावे के लिये ही सही, इसकी धमक सत्ता के गलियारों में भी दिखने लगी है. पिछले दिनों जहां हर मंत्रालय के मुखिया अपने हाथों में झाडू लिए नजर आये, वहीं तमाम सार्वजनिक उपक्रमों ने इसे एक घोषित सरकारी काम के रूप में अपनाया.

पर क्या ही बेहतर होता अगर यह अभियान केवल दिखावे या प्रधानमंत्री की नजरों में चढने का आयोजन भर न रहकर दिल से अपनाया जाता. मोदी जी इस बात के लिये बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने समाज के हाशिए पर पहुंच चुकी उस बुराई की तरफ ध्यान दिया, जिसके अब तक कब का खत्म हो जाने की जरूरत थी. पर अगर देश से गंदगी खत्म नहीं हुई तो उसके लिए कहीं न कहीं से सारे देशवासी जिम्मेदार हैं.

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जीवन भर आश्रमों में रहे, जिनमें से तमाम मिट्टी और खपरैल के, प्रकृति की गोद में थे, पर बावजूद इसके, इनकी सफाई देखते ही बनती थी. बापू अपने अधिकांश काम खुद ही करते थे, पर क्या मजाल कि बीमारी के दिनों में भी कभी गंदगी उनके आसपास भी फटक जाए.

दीवाली में परम्परागत तौर पर हिन्दू घरों में साफ-सफाई का अभियान चलता है. इसलिये कि मान्यता यह है कि उस दौरान साफ-सुथरे घरों में लक्ष्मी निवास करती हैं. अगर यही सच है, तो फिर पूरे साल हम उसी तरह से साफ-सुथरा क्यों नहीं रहते.

धन की देवी लक्ष्मी को आखिर हम अपने पास हर वक्त क्यों नहीं रखना चाहते. केवल दीवाली-दीवाली ही उनका बुलावा क्यों? इसी तरह से मुसलिम परिवारों मे शबे-बारात के दिन साफ-सफाई पर बहुत महत्त्व दिया गया है. ईसाई और सिख धर्म भी साफ-सफाई के इस महत्त्व से अनजाने, अछूते नहीं हैं. फिर भी गंदगी...

सच तो यह है कि गंदगी से नजात दिलाना केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी भर नहीं है. यह हमारा, आपका, हम सबका काम है, हम सबकी जिम्मेदारी है कि सफाई को अभियान भर न बनाकर उसे अपनी जीवन पद्धति के रूप में अपनायें.

इसी तरह प्रधानमंत्री जी के सोशल मीडिया में सक्रिय होने की वजह से सरकारी विभागों में देखादेखी पाप-देखादेखी धर्म की तर्ज पर सोशल मीडिया में आने की होड मची हुई है.पर उनकी  इस होड से पहले से ही मजबूत और पूरी तरह से विदेशी प्रभुत्त्व में रहने वाले व्यापारी घराने मजबूत हो रहे हैं. जबकि जरूरत है इस दिशा में काम कर रहे देशी, छोटे, मझले उद्यमों को मजबूत करने की. विशेषकर समाचार जगत से जुडी उन वेबसाइटों पर खास ध्यान देने की जो सरकारी अभियानों और सूचनाओं को जन-जन तक पहुंचाने की सरकारी कोशिशों में मददगार साबित हो रहे हैं.

केंद्र का एक सरकारी महकमा बाकायदा यह काम देखता है, पर उसने इस तरफ अभी ध्यान नहीं दिया है. जबकि तेजी से बदलती दुनिया से अगर भारत को कदमताल करनी है, तो उसे अपने तई, अपने लोगों को बढावा देना ही होगा. चीन आज अमेरिका के मुकाबले हर क्षेत्र में खडा है तो इसीलिए कि उसने अपने लोगों, अपने उद्योगों को किसी भी विदेशी कंपनी से ज्यादा तरजीह दी. हमारे प्रधानमंत्री जी सुन रहे हैं क्या?

पुनश्चः पिछले से पिछले संपादकीय में 'जनता जनार्दन' ने प्रधानमंत्री जी से गुजारिश की थी कि उनका कार्यालय जनता से जो भी पत्र पा रहा है, कम से कम उन की पावती और उनपर हो रही काररवाई पत्र-प्रेषकों को मुहैया कराये. अच्छी बात यह है कि इसकी शुरुआत हो चुकी है. प्रधानमंत्री कार्यालय इस सकारात्मक बदलाव के लिए बधाई का पात्र है.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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