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इतना निजी भी नहीं

इतना निजी भी नहीं दोस्तो, हर किसी के जीवन में कुछ घटनायें, कुछ बातें होती हैं, जो न केवल आपको झकझोर कर रख देती हैं, बल्कि जिनसे आपके जीवन की दिशा ही बदल जाती है. रत्‍नाकर डाकू से 'महर्षि बाल्मिकी' बनने और मोहन दास करमचंद गांधी के 'महात्मा' बनने की यात्रा में उनकी किसी चाहत और प्रयास का नहीं अचानक घटे हालातों का हाथ था.

अक्टूबर का पहला हफ्ता मेरे लिये किसी मानसिक जलजले से कम नहीं था. मैं एक ऐसी घटना से गुजरा, जिससे मन और सोच उस दशा में जा पहुंचे...जहां शब्द थे ही नहीं...था तो केवल दुःख, पीडा, क्षोभ... न जाने किस तरह का भाव. समझ ही नहीं आ रहा था कुछ...और उस दौर में जो शब्द बचे भी थी, वे बडे बेतरतीब से थे, जिनका कोई ओर छोर था नहीं. ये कितने सच थे, पता नहीं, कितने झूठ ये भी पता नहीं. सही सोच भी रहा था कि नहीं, पता नहीं, सही दिशा में था या नहीं, पता नहीं. मन के हालातों का एक छोटा सा हिस्सा, उसकी बेहद छोटी सी एक झलक फेसबुक की मेरी एक आईडी पर लगातार ५ दिनों तक इजहार होती रही.

अक्टूबर-३ को मैंने लिखा थाः
दोस्तो!
मेरा मानना है कि झूठ की बुनियाद पर कोई रिश्ता टिक नहीं सकता, अपनी सहमति और असहमति बताएं. क्या करें दोस्ती में जब यह अहसास होने लगे कि- मौसम की तरह दोस्त बदल जाते हैं?

अक्टूबर-४ को लिखाः
दोस्तो, क्या करें जब किसी अपने का, किसी बहुत अपने का, किसी दोस्त का, किसी खास दोस्त का कोई व्यवहार आपको, आपके मन को इतनी गहराई तक चोट पहुंचा दे कि मन भर आये और आप गालिब के इस बोल पर ठहर जायें कि-
हाँ वो नहीं खुदा-परस्त, जाओ वो बे-वफ़ा सही
जिसको हो दीन-ओ-दिल अज़ीज़, उसकी गली में जाएं क्यों?
दिल ही तो है न संग-ओ-खिश्त दर्द से भर न आये क्यों?
रोयेंगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यों?

अक्टूबर-५ को लिखाः
दोस्तो, कितना इत्तिफाक रखते हैं आप इन सतरों से-
मुझे छोड़ दे मेरे हाल पर, तेरा क्या भरोसा है चारागर
ये तेरी नवाज़िश-ए-मुख़्तसर, मेरा दर्द और बढ़ा न दे
मेरा अज़्म इतना बलंद है कि पराये शोलों का डर नहीं
मुझे ख़ौफ़ आतिश-ए-गुल से है, ये कहीं चमन को जला न दे.

अक्टूबर-६ को लिखाः
दोस्तो! आप कितने सहमत हैं, चचा गालिब से -
कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती
मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती

अक्टूबर-७ को लिखाः
इनसान घर बदलता है,लिबास बदलता है, रिश्ते बदलता है, दोस्त बदलता है. फिर भी परेशान क्यों रहता है? - "क्यों वो खुद को नहीं बदलता." मिर्जा गालिब ने कहा हैः
" उम्र भर गालिब यही भूल करता रहा, धूल चेहरे पर थी, और आइना साफ करता रहा"

और आज अक्टूबर ८ को यह लिखने बैठा हूं.
अक्टूबर २ को बापू की जयंती बीती है और आज बाल्मिकी जयंती है. अपने मन के हालातों से इन्हें जोडने का क्या मतलब? गांधी और बाल्मिकी बहुत महान इनसान, महान आत्मा थे. जबकि मैं ...किस श्रेणी में हूं पता नहीं,हूं भी कि नहीं, पता नहीं. पर इन दिनों कुछ बातें खास तौर पर समझ में आईं, जैसे- महात्मा और महात्मा के हत्यारे नाथूराम गोडसे में क्या अंतर था? दोनों परम पिता ईश्वर के प्रति समर्पित थे... गोडसे को बापू की हत्या पर कोई दुख नहीं था. उसने अदालत में भी कहा था, 'उसे गांधी जी की हत्या पर कोई दुःख नहीं. वह अपने स्रष्टा से मिलने को उत्सुक है.' जबकि बापू  ने कुछ समय पहले ही अपनी इच्छा जताते हुये मनु बेन से कहा था- 'मैं चाहता हूं, मैं किसी आतताई की गोली से मरूं, आखिरी वक्त मेरे आसपास तुम लोगों जैसे मेरे अपने हों. मैं तुम्हारी गोद में दम तोडूं और मेरे होठों पर ईश्वर का नाम हो.' कुछ देर रुक कर बापू ने कहा था, 'अगर ऐसा न हो, तो मैं तुम्हें आदेश देता हूं कि भले ही लोग तुम्हें पत्थर मारें, पर तुम छत पर खडी होकर कहना- बापू, महात्मा नहीं, ढोंगी था.'

यह था गांधी और गोडसे में अंतर. दरअसल, 'सत' और 'तम', 'ईश्वर' और 'शैतान', ये दोनों हमारे, मन, विचार, कर्म, सोच और प्रारब्ध से हमारे अपने भीतर चलते रहते हैं. पर ईश्वरीय कृपा और व्यवस्था का सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि यह जहां हमें 'अंतर का संतोष', 'पूर्णता' और 'सुकुन' के साथ-साथ भय और संशय भी देता है, वहीं यह मौका भी कि उस संशय से भयग्रस्त हो, सही दिशा में सोच कर हम अपने आप को परिमार्जित करें और आगे बढते रहें. जबकि शैतानी व्यवस्था इनसान पर भूत की तरह सवार होती है और उसे अपनी सोच, अपने विचारों में इस कदर जकड लेती है कि अपने से इतर सोचने का मौका तक नहीं देती. शैतान के प्रभाव में आई शख्सियत यही सोच रही होती है कि वह जो कह रही, कर रही, वही सही है. यहां मैं किसी इनसान की बात नहीं कर रहा. अपने 'अंतर के सोच' की बात कर रहा. क्या आपने किसी भूत सवार व्यक्ति को नहीं देखा? जो अपने आपे में ना हो. इस तरह की शैतानी विचारों के चंगुल में फंसी शख्सियत मौत को गले लगाने तक से भी नहीं कतराती, और अपने हर किये पर गर्व भी महसूस करती हैं. क्योंकि शैतान अगर उसे इतनी बुरी तरह से ना जकडे, तो वह अपनी बरबादी को अपनी खुशी कैसे समझेगा? गोडसे ने भी तो यही किया था. अपनी समझ से सच और सही कदम था उसका...पर कितना? 

गांधी और गोडसे का यही अंतर हमारी आत्मा, हमारे कर्म, हममें से हर एक की सोच और व्यवहार में निरंतर चलता रहता है. यह सोचना हमें है कि हम किसके प्रभाव में हैं, हम खुद को कितना सोच और समझ पा रहे, हमारे दुःख का कारण क्या है, और उसके निदान की दिशा में बढाया गया हमारा कदम हमें कहां पहुंचायेगा...बापू ७८ साल की उम्र में अपनी आखिरी सांस तक यही करते रहे, सोचना, समझना, बदलाव और कर्म...और गोडसे- एक गलत आदर्श पर कुर्बानी. बापू की हत्या...शर्म.

अभी विजयादशमी बीती है. अच्छाई पर बुराई की जीत का पर्व. कमियां, हताशा, निराशा, सुख, दुःख हममें से किसके जीवन में नहीं है? पर हम कर्म के साथ परिणामों को जोड लेते हैं. आम का पेड लगाकर अगर फल खाना है, तो उसके बढने और फल देने तक की उम्र का इंतजार तो करना ही होगा. बेचैनी और असंतोष से परे हट कर शांति और संतोष अपने भीतर ढूंढना होगा. हर बार यह याद रखना होगा कि, 'तोरा मन दरपन कहलाये, भले बुरे सारे करमन को देखे और दिखाये...'पर यह देखना बापू की तरह का हो, गोडसे की तरह का नहीं. रही सफलता की बात, तो 'लगान' फिल्म के गीत की यह पंक्ति याद आ रही, '... सच और साहस है जिसके मन में, अंत में जीत उसी की है'.

इस दौर में उन सभी स्वजनों से क्षमा, जो मेरे व्यवहार से आहत हुए, उन अपनों का धन्यवाद, जिन्होंने इस हालात से उबरने में मेरी मदद की. उनका भी धन्यवाद, जिनके चलते मैं जीवन में प्रार्थना के महत्त्व को समझ पाया, साथ ही इस बात को भी कि जीवन चलने का नाम...ईश्वर सब पर कृपालु हों, सबको सन्मति दें!

पुनश्चः  मैं स्नातक तक दर्शन का छात्र रहा हूं, इसलिये भारतीय और पाश्चात्य दर्शन का तुलनात्मक अध्ययन तो किया है, पर अंगरेजी भाषा और साहित्य में अपना हाथ तंग है. मैंने अनेकों बार सोचा, समझने की कोशिश की कि- आखिर माइकल जैकसन,  व्हिटनी हौस्टॉन के जीवन में क्या कमियां थीं, जिसने इन्हें अकेलेपन की तरफ ढकेला? ड्रग्स लेकर ये कौन सा सुख हासिल कर रहे थे? आखिर शोहरत, सफलता और समृद्धि के शिखर पर पहुंच कर भी ये अपनी कमियों को ही महसूस क्यों करते रहे? अपनी सफलता, अपने उन गुणों को क्यों नहीं देखा, जो उनके पास था. आखिर वह निगेटिव विचारधारा से इस कदर क्यों घिर गये कि उन्हें नींद के लिये दवायें लेनी पडती रहीं. आखिर ये कौन सा सुख पाना चाह्ते थे, जो इन्हें नहीं मिला था और जिसकी चाह में ये इस कदर भटक रहे थे कि...मुझे लगता है शायद इन्होंने यह नहीं पढा रहा होगा कभी-  'कस्तुरी कुंडल बसे, मृग ढूंढे वन मांहि...'   अंगरेजी वाले मित्रों ध्यान दें, इसके टक्कर का कुछ हो आंग्ल साहित्य में तो जरूर बतायें..
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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