छन से जो टूटे कोई सपना

छन से जो टूटे कोई सपना आजाद भारत ने 68 साल की उम्र आज छू ली. यह उम्र किसी भी देश के, उस के इतिहास के हिसाब से बहुत बड़ी भले ही ना हो, पर इतनी छोटी भी नहीं कि इसकी अनदेखी की जा सके. वह भी 21 सदी में तरक्की की रफ़्तार पर कदमताल करती उस दुनिया में, जिसने केवल पिछले 4 दशकों में व्यापार, तरक्की और टेक्नोलॉजी के वे कीर्तिमान गढ़ दिए, जो इंसानी सभ्यता के लम्बे इतिहास में धार्मिक पुरुषों और उनके कारनामों से भरे ग्रंथों से इतर अबूझे थे.

उदाहरण के लिए हम यहां ज्यादा बड़ी चीजों, उद्द्योग धंधों, कल-कारखानों, वैज्ञानिक खोजों, मॉल्स, रोड, इंफ्रास्ट्रक्चर, चिकित्सा, शिक्षा, रक्षा, सिंचाई और अंतरिक्ष अभियानों के हलके में हुई खोजों को नहीं ले रहे, बल्कि आम से ख़ास तक फ़ैल चुकी संचार क्रांति के साधन यानी केवल 'मोबाइल फोन' और 'इंटरनेट' को ले रहे हैं.

आज के दौर में हमारे जीवन के किसी भी क्षेत्र की कल्पना क्या संचार के इन साधनों के बिना सम्भव है? नहीं!  तो फिर ये कितने पुराने हैं? अपने देश में इन साधनों के उपयोग की उम्र कितनी है? भारत में पहली मोबाइल कॉल 31 जुलाई  1995 को सम्भव हो पाई थी, और उसी साल 15 अगस्त 1995 को वीएसएनएल ने देश में पहली बार इंटरनेट सेवा शुरू की थी.

इन माध्यमों की अहमियत क्या है, इसे ऐसे समझ सकते हैं कि देश का कोई भी सेक्टर आज इसके बिना हिल भी नहीं सकता. चाहे वह रक्षा हो या रेल, पानी हो या बिजली, शिक्षा हो या चिकित्सा. क्या हम ऐसे किसी समाज की कल्पना कर सकते हैं, जिसे इन सबकी जरूरत ना हो? फिर अपने भारत में तो इस माध्यम की अहमियत तब और भी बढ़ जाती है, जब एक गरीब परिवार से आया, चाय बेच कर अपने परिवार की मदद करने का दावा करने वाला एक लड़का, एक संगठन से जुड़, देश-सेवा का हौसला बुन, धीरे-धीरे राजनीति की राह पर चलते-चलते पहले अपने राज्य में और फिर वहीं से अपने कौशल से बदलाव के नारे गढ़, इन्हीं साधनों का इस्तेमाल कर, जनता के मन-मिजाज पर छा कर, ना केवल स्वतंत्र भारत का पहला पूर्ण बहुमत वाला गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बनने में सफल रहा, बल्कि अब उसकी ज्यादातर बातों के इजहार का, देश की आम जनता से उसके संवाद का माध्यम केवल यही साधन है. क्या कम्प्यूटर, इंटरनेट व मोबाइल फ़ोन के बिना नरेंद्र मोदी के ट्वीट की कल्पना भी की जा सकती थी/ है? नहीं !

पर इन बातों पर और भी विस्तार से चर्चा करने से पहले, आज की इस पावन तारीख को उन स्वतंत्रता सेनानियों के नाम करते हैं, जिनके जूनून और संघर्ष ने देश को वह मौैका दिया, जिससे न केवल हमारा आज हमारे हाथ है, बल्कि हमारा कल भी. इसी तरह यह दिन इस देश की सुरक्षा और संरक्षा से जुड़े उन जवानों के नाम, जिनकी हिम्मत और बहादुरी के दम पर हम चैन की सांस ले पा रहे. उन वैज्ञानिकों और गुरुओं के नाम, जिनकी शिक्षाओं और खोजों के दम पर देश ने तरक्की की ढेर सारी इबारतें लिखीं. यह दिन देश के कारखानों में काम करने वाले मजदूरों और गांव के खेत-खलिहान में काम करने वाले उन लाखों करोड़ों किसानों के भी नाम, जिनकी क़ुरबत ने देश को यहां पहुंचाया.

इस लिस्ट में डॉक्टर, इंजीनियर, अफसर, समाजसेवक सब शामिल हैं, पर पता नहीं क्यों, कृतज्ञता और धन्यवाद ज्ञापित करने वाली इस लिस्ट में अपने आज के 'जन' नेताओं को शामिल करने का मन नहीं कर रहा. हालांकि इनमें से कुछेक मेरे मित्र हैं, कई वाकई देश के लिए कुछ करना भी चाहते हैं, कर भी रहे हैं, पर ये अपवाद हैं और अफ़सोस की अपवादों से देश नहीं चलता, उसके लिए समूह की, सही सोच और पहल की, कथनी और करनी में अंतर न रखने की जरूरत होती है. वरना अपवाद तो हर जगह होते हैं. अफसोस की केवल मेरा ही नहीं, देश की आम जनता का मिजाज भी यही है, अन्यथा देश में हर स्तर के चुनाव में निर्वाचन आयोग की तमाम कोशिशों के बावजूद मतदान का यह प्रतिशत नहीं होता. इतना खराब मतदान प्रतिशत कि हम बहुमत के नाम पर अल्पमतों के नुमाइंदों को हुजूर-सरकार के रूप में ढो रहे हैं.

लाल किले के अपने पहले सम्बोधन में बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईमानदार दिखने, देश के लिए कुछ करने और सरकार को जनता की सक्रिय भागीदारी से जोड़ने के लिए तमाम बातें कहीं. देश की बेटियां, महिलाओं की सुरक्षा से शुरू कर, स्वच्छता, सफाई, युवा भारत, रोजगार, प्रवासी भारतीय, जवान और किसान, तरक्क़ी, गांव- शहर, योजना आयोग से लेकर, महर्षि अरविन्द, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी,  लाल बहादुर शास्त्री  और जय प्रकाश नारायण तक, पड़ोसी मुल्क, सांसद, युवा और...एक तरह से राष्ट्र के नाम सम्बोधन में उन्होंने देश की समूची जनता से, सभी से कुछ न कुछ कहा, किसी को झकझोरा, किसी को बुलाया, किसी को चेताया, तो किसी को जगाया...कुछ से उन्होंने सवाल भी पूछे. एक तरह से जो कुछ भी उन्होंने कहा, वह सारा कुछ हो जाए, तो कितना अच्छा हो! है ना? पर उनसे पहले भी तो देश ने ऐसी ही बातें, एक नहीं, तकरीबन 67 बार सुनीं हैं.लाल किला पर सम्बोधन करने वाले चहरे बदल जाते हैं, पर जनता के हालात नहीं बदलते.

प्रधानमंत्री जी! देश की तरक्की में आम जनता की भागीदारी का आह्वान करना तब तक केवल जबानी जुगाली भर है, जब तक सभी को काम करने और तरक्की करने के समान अवसर ना मिलें. बापू ने कहा था, जब तक देश के आख़िरी व्यक्ति तक विकास की रोशनी न पहुंचे, उसे आजादी का अहसास ना हो, तब तक हमारी आजादी अधूरी है. आप कह सकते हैं, हम अभी आये हैं, हमें वक्त चाहिए... सही है, पर देश की आम जनता अभी तक यही तो करती आ रही है, सभी को वक्त ही तो देती आ रही है, उसके पास देने को यही एक चीज है पर आपके पास... आपने अपने लिए, केवल एक सहयोगी ' सेक्रेटरी' के लिए देश का कानून बदलवा दिया, संविधान में बदलाव करा दिए, जनता के लिए केवल इतना भर करा दीजिये कि, उसे उसके आवेदनों पर, प्रार्थना-पत्रों पर, सवालों पर- नियत समय में जवाब भर मिल जाए. भले ही वह 'हाँ' या 'ना' में हो.

मैं समझता हूँ, आजाद भारत की जनता, देश की आजादी के 68 साल बाद, इतना छोटा सा हक़ तो रखती ही है. आपको एक मजे की बात बताऊँ, पर बताऊँ कैसे ? आप तक तो मेरी पहुंच है नहीं, और आप का कार्यालय, देश का सबसे ताकतवर कार्यालय, 'प्रधान मंत्री कार्यालय' के पास वक्त कहां किसी की बात सुनने के लिए. आप ने एक पोर्टल शुरू किया, आपकी मेल आईडी है, जिस पर जनता रोज चिट्ठियां भेजती है, अपना दुखदर्द कहती है, आपसे सहयोग और न्याय मांगती है, पर उसे  जवाब नहीं मिलता, उन पर कार्यवाही नहीं होती. यह मेरा खुद का ,मेरे जैसे हजारों - लाखों लोगों का अनुभव है. यही नहीं, लोग आपके कार्यालय में चिट्ठियां रिसीव करा कर लौटते हैं, फिर भी सुनवाई नहीं होती, उन्हें जवाब नहीं मिलता.

आपकी बातों और नीयत पर कोई शक नहीं प्रधानमंत्री जी! पर अगर लोगों को आपके दरवाजे से भी न्याय और राहत ना मिले, तो आम जनता के लिए क्या फर्क रहा, दूसरों में और आप में? रियासतों-रजवाड़ों,  अंगरेजी शासकों और आजाद भारत के फर्क को, जब तक जश्ने आजादी के दिन अपने-अपने काम में, अपनी रोजी-रोटी के जुगाड़ में, देश की तरक्की में अपने 'कर्म' से अपने-अपने 'स्तर' से लगा हर आदमी ना महसूस कर सके, तब तक सारे वादे झूठे हैं, देश की आजादी अधूरी है. इनमें रिक्शावाले से लेकर जहाज चलाने वाला  पायलट तक शामिल है. किसान आज भी खेत पर गया होगा, जवान आज भी सरहद पर मुस्तैद है..इन सबके लिए सोचिये, सिर्फ सोचिये ही नहीं, करिये.

जाहिर है, इन सबके बीच जिसे याद करना है, वह है हमारा लोकतंत्र, आजाद भारत की हमारी- आप जैसी, हम जैसी जनता, जिसका विश्वास अभी टूटा नहीं है. जो जिंदा है, अपने दम से उन सपनों के साथ, जिसे आजादी के दीवानों ने देखा था, इस उम्मीद के साथ की वो सुबह कभी तो आएगी...तब तक- माँ तुझे सलाम ! वन्दे मातरम्!

आजाद भारत के नागरिकों को, समूची दुनिया में रह रहे भारतीयों को, और उन सभी को भी जो नित-निरंतर मानवीय आजादी के उत्थान में लगे हैं- 'जश्ने -आजादी' मुबारक!

पुनश्च: आप सबके सहयोग और प्यार दुलार से आज 'फेस एन फैक्ट्स' और 'जनता जनार्दन' ने अपने ४ साल पूरे कर लिए. आज से ठीक २० साल पहले देश में पहली इंटरनेट सेवा भी शुरू हुई थी. सो इस अवसर के लिए भी आप सबको बधाई!   धन्यवाद !
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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