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पढ़ सको तो पढ़ लो जनता का सबक

जय प्रकाश पांडेय , May 18, 2014, 3:14 am IST
Keywords: Election results  Lok Sabha poll analysis  JantaJanardan  Reason of Congress defeats  BJP's victory  लोक सभा चुनाव परिणामों की समीक्षा   
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पढ़ सको तो पढ़ लो जनता का सबक जनादेश 2014! किस तरह का था?  भाजपा जीती या कांग्रेस हारी ? नरेंद्र मोदी लहर थी या राहुल गांधी फेल हुए? जातीय समीकरण टूटे या विकास की बयार बही? जैसे सवालों के उत्तर से कहीं बड़ा है, और इसे लेकर राजनीतिक विश्लेषकों और विद्वानों की अपनी-अपनी राय हो सकती है. पर इतना तय है कि जनता कांग्रेस को हराना चाहती थी, केवल कांग्रेस को ही नहीं, हर उस बड़े-छोटे नेता को हराना चाहती थी, जिसे यह बदगुमानी हो गयी थी कि भारत के महान जनतंत्र में जनता के वोटों से उसका नुमाइंदा भर चुना गया शख्स, जिसे जनता ने ही जनसेवा के वादे पर चुना था, वही उससे राजाओं-महाराजाओं जैसा बरताव करने लगा था, और जनता थी कि वह गरीबी, अवसरवादिता, भ्रष्टाचार, जातिवाद और परिवारवाद जैसी बुराईयों के दावानल में भुन कर, पीड़ा से, दर्द से कराह रही थी, पर उसके दर्द की न कोई दवा ही थी, न ही सुनवाई.

पता नहीं हमारे नेताओं को बस इतनी सी बात समझ क्यों नहीं आती कि देश की जनता की जरूरतें भी उसी की तरह बहुत 'आम' हैं. उसे खास लोगों से एतराज नहीं, पर उसे जब उसकी रोटी की जरूरतों के बदले केवल 'लॉलीपॉप' मिलता है और उसके सामने ही नेताओं, भ्रष्ट अफसरों और दलालों की 'तिकड़ी' मलाई काट रही होती है, तो उसे कोफ़्त के साथ-साथ गुस्सा भी आता है, भले ही उसे इसके इजहार का मौका तुरंत न मिले, पर जब भी मिलता है, 5 साल बाद ही सही, छलक कर सामने आता है... और जब आता है तो राजनीति के बड़े-बड़े तथाकथित सूरमाओं की लुटिया तक डूब जाती है, जमानत तक नहीं बचती...भला रोटी की भूख कहीं 'लॉलीपॉप' से बुझती है? और लोकतंत्र का यह सच तरक्की , वादों, नारों, इरादों, व्यक्तित्व, राजनीति, वाद और रणनीति सब पर भारी होता है. यह सच सभी दलों के लिए एक समान मौजूं है. जितना हारी हुई कांग्रेस के लिए, उतना ही विजयी भाजपा के लिए.

बिना किसी दुराग्रह के अगर ध्यान से सोचें तो मन में यह सवाल उठता है, आखिर कौन हैं नरेंद्र मोदी? क्या है भाजपा? कहां से आई इनमें इतनी ताकत की इन्होंने आजादी के आंदोलन से जुड़ी और देश पर पिछले पूरे एक दशक से शासन कर रही कांग्रेस को कायदे से मुख्य विपक्षी पार्टी तक नहीं रहने दिया? ठीक इसी तरह कौन हैं सोनिया गांधी? राहुल गांधी आखिर क्या चीज हैं? कितने बड़े नेता हैं ये? कहां से आती है इनकी भी ताकत? नेहरू-गांधी परिवार के खानदानी नाम, जिसने इन्हें राजाओं की सी स्थिति में पहुंचा दिया उसकी शुरुआत से चलते हैं. मोती लाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, जिनके नाम पर अब तक ये दोनों जी- खा रहे थे, उन्हें ताकत किसने दी थी? इसी जनता ने ही ना? आखिर कोई भी नेहरू-गांधी सत्ता में सालों साल बने रहने के बाद भी ' बापू' की जगह तो नहीं ले पाया! कभी ले भी नहीं पायेगा! क्योंकि बापू लोगों के दिलों में जिन्दा थे, हैं और रहेंगे! कोई भी नेहरू-गांधी, अटल- मोदी कभी ' बापू' की जगह नहीं ले पायेगा. चाहे जितनी भी कोशिश कर ले, चाहे जितनी बार सत्ता हासिल कर ले, चाहे जितनी योजनाएं खुद के नाम पर चला ले, जितना विज्ञापन कर ले.

ऐसा इसलिए है, क्योंकि जनता से इनमें से किसी का जुड़ाव महात्मा गांधी की तरह नहीं है, और ये महात्मा बनना भी नहीं चाहते, पर जब जनता की ताकत से ही इनको ताकत मिलनी है, मिलती है,  तो फिर सत्ता पाने, कुछ रुपये कमा लेने, बड़ी-बड़ी गाड़ियों, सुरक्षा ताम-झाम में चलने और दिल्ली या राज्य मुख्यालयों में सत्ता सम्हालते ही इनका दिमाग ख़राब क्यों हो जाता है? हंसी आ रही, मोदी, सोनिया, राहुल की क्या कहें? सत्ता पाते ही दिमाग तो केजरीवाल, मायावती और मुलायम सिंह जैसों तक का सातवें आसमान पर चढ़ जाता है, इसीलिये जनता को जब भी मौका मिलता है, वह इन तथाकथित नेताओं को धोबीपाट मारती है, उठाकर पटकती है, वहां जहां से इन्हें सबक मिले, पर इन्हें तो... शर्म इनको मगर आती नहीं.  

लोकसभा चुनाव 2014 के परिणामों की अगर मैं अपने हिसाब से समीक्षा करूं, तो फिर से यही कहूंगा कि कांग्रेस को जनता की अनदेखी और उसका घमंड ले डूबा. कांग्रेस में सोनिया गांधी और राहुल गांधी की तो छोड़िये कांग्रेस का अदने से अदना नेता भी अपने को देवराज इंद्र से कम नहीं समझ रहा था. जनता से हरदम जुड़ा रहने वाला यह नेहरू-गांधी परिवार सिर्फ एक कोटरी की जागीर बन गया था. कांग्रेस को मोदी लहर ने नहीं उसकी अपनी करनी ने नेस्तनाबूद किया. चाहे भाजपा और मोदी जी जितने भी दावे करें, पर यह सच है कि जनता में उनकी स्वीकारोक्ति को कांग्रेस की नाकामी और अराजकता ने परवान चढ़ाया.

मैं इस बात से भी इत्तिफ़ाक़ नहीं रखता कि यह चुनाव ' विकास' के मुद्दे पर लड़ा गया. अगर विकास ही सब कुछ होता तो पिछले साल दिल्ली विधान सभा चुनावों में शीला दीक्षित न हारतीं. देश में तरक्की का मॉडल 'गुजरात' नहीं 'दिल्ली' है, फिर भी कांग्रेस हारी, तो नेताओं का एरोगेंस, जनता से उनका कटना, और अंतहीन महंगाई जिम्मेदार थी. मोदी के विकास मॉडल में बिजली और अच्छी सड़कों के साथ हर व्यक्ति को काम और रोजगार का भी वादा था, जिसने युवाओं को लुभाया. मोदी ने सोशल मीडिया का भी जम कर इस्तेमाल किया. युवाओं से कनेक्ट करने के लिए इंटरनेट और कम्युनिकेशन की ताकत को पहचाना, जबकि कांग्रेस तो इंटरनेट को कोई मीडियम मानती ही नहीं थी. मनीष तिवारी जैसे इसके हवाई नेताओं ने इंटरनेट न्यूज़ वेबसाइटों की ताकत को कभी पहचाना ही नहीं.. पर भाजपा की ऐतिहासिक जीत के बावजूद मैं इसे मोदी लहर नहीं मानता.

यह लहर भ्रष्ट नेता हटाओ लहर थी, मदांध कांग्रेसियों को सबक सिखाओ लहर थी. जनता, कांग्रेस और जनमत की दुकान खोल कर 'जनता' को ही ठेंगा दिखने वाले नेताओं को सबक सिखाना चाहती थी, इसीलिये उसने न केवल कांग्रेस को, बल्कि इस तरह के सभी नेताओं मायावती, मुलायम सिंह यादव, नितीश कुमार, शरद पवार, लालू प्रसाद यादव और चौधरी अजीत सिंह जैसों तक को धूल चटा दी. जनता के ' बदलाव' के इस बवंडर में  बड़े-बड़े सूरमा जहां फेल हो गए, वहीं जो नेता जनता से जुड़े थे, उन तक मोदी की हवा भी नहीं पहुंच पाई. ओड़िशा में नवीन पटनायक, तमिलनाडु में जयललिता, पश्चिम बंगाल में  ममता बैनर्जी की सफलता बतला देती है कि देश में कैसी लहर थी. जनता की चाहत क्या थी.

दार्शनिक अंदाज में कहें तो सच तो यह है कि कहीं ना कोई जीता, ना कहीं कोई हारा? केवल जनता ही जीती, उसी ने हराया! जनता ही दिग्विजयी, वही संहारक. लोकतंत्र के दौर में 'काल-चक्र' जनता के रूप में नेताओं के सामने खड़ा होता है, इसलिए वह आदर का, मान का पात्र है, अनदेखी का नहीं. इन्हीं उम्मीदों के साथ की भाजपा और एनडीए की यह जीत देश के लिए शुभ हो, कांग्रेस और यूपीए की हार उसे आत्मविवेचन कर फिर से उत्तिष्ठ होने की हिम्मत दे.
जय हो जनता जनार्दन की.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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