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बधाई! पर युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ

बधाई! पर युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ नेल्सन मंडेला! हमारे वक़्त के बिलाशक सबसे बड़े नायक, महान नेता, जीवंत गांधी को 1990 में जेल से रिहा होने के तुरंत बाद अंग्रेजी में भेजे गये मेरे टेलीग्राम के भाव यही थे, 'बधाई! पर युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ'. क्या सोच कर यह लिखा था, ठीक - ठीक याद नहीं, पर इतना आभास था की जिस प्रोटोरिया सरकार ने उन्हें 27 साल तक जेल में रखा, उसने उन्हें रिहा तो कर दिया है , पर दक्षिण अफ्रीका में चुनावों की घोषणा अभी नहीं हुई है, यानी संघर्ष कब तक खिचेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता।

आज के म्‍यांमार की तरह. साल 2013-14 में भी दावे से यह कौन कह सकता है की म्यांमार में इनसानी हुकुक की लड़ाई कर रही नोबेल शांति पुरस्कार विजेता आंग सान सूकी कब तक बाहर हैं और कब अंदर ? भले ही दौर बदल गया हो, दुनिया ' विश्‍व गांव ' के रूप में तब्दील हो चुकी है और संचार माध्यमों ने इनसान की अंगुलियों पर बसेरा कर लिया है, पर बर्मा के सियासी समीकरणों, हालातों, सैनिक शासन और सूकी के भविष्य पर सटीक टिप्पणी असंभव सी है।

फिर वह तो 1990 था . मंडेला हमारे हीरो थे , रीयल लाईफ हीरो . काशी हिन्दू विश्‍वविद्यालय में पढ़ाई के साथ - साथ पत्रकारिता और उसमें भी यशस्वी पत्रकार, अग्रज एस अतिबल से जुड़े होने के चलते जीवन सत्‍य, न्याय, अहिंसा, सेवा, कर्तव्यपरायणता जैसे आदर्शों से भरा था. तब ना तो दिल्ली के छलावा भरे माहौल से साबका हुआ था,  ना ही ' हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन, दिल को बहलाने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है' की तर्ज पर दुनिया की बेरहम सचाइयों से बावस्ता था. तब यह भी नहीं पता था की आने वाले कल में वक़्त कुछ यों बदलेगा की अपने इन्हीं जीवन मूल्यों की कीमत चुकानी होगी ।

हालांकि पैसों की अहमियत उस वक़्त भी थी, पर आज जितनी नहीं कि इनके लिये बेटे के पास पिता तक के लिये वक़्त नहीं है। पैसा ही आज के दौर की सबसे बड़ी चीज हो गई है और मंडेला और गांधी जैसे नायक दंतकथाओं का हिस्सा, जिन्हें पढ़ना - पढ़ाना तो ठीक, पर जीवन में उतारना, तौबा - तौबा । हमने, हम जैसों ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को नहीं देखा था, देश की आजादी की लड़ाई नहीं लड़ी थी, जिसका मलाल था.

भले ही हमारा वह दौर सियासी नारों, फरेबी वादों का दौर था और तथाकथित बड़े शहरों, बड़े लोगों में तब तक आदर्श धूमिल होने लगे थे और उनकी जगह सत्ता की तिकड़म ने ले ली थी. पर गांव और छोटे कस्बे तब भी तमाम बदलावों से अछूते थे. ऐसे में सुबह 7 बजे पहुंचने वाले अखबारों,  कुशवाहा कांत के आजादी आंदोलन की पृष्ठभूमि वाली किताबों और मैक्सीम गोर्की के 'मां' और 'मेरा बचपन' जैसे उपन्यासों को बचपन से ही पढ़- पढ़ मंडेला का आदर्श नायक के रूप में उभर आना और दलाई लामा, आंग सान सूकी के प्रति आदर सहित झुकाव स्वभाविक था। तब दक्षिण अफ्रीका में मंडेला का आंदोलन अपने देश के आजादी के आंदोलन जैसा लगता था और ' मदीबा' बापू जैसे लगते थे।

इसीलिए 1990 में मंडेला जब रिहा हुए तो बिना उनका पता ठिकाना जाने बधाई संदेश भेजने की ठानी. इतना पता तो था ही की आजादी के दौर में बापू तक विदेशों से आई ऐसी भी चिट्ठियाँ पहुंची थीं , जिन पर सिर्फ इतना लिखा होता था : श्री मोहनदास करम चंद गांधी, भारत. या महात्मा गांधी, इंडिया. मैंने भी 'श्री नेल्सन मंडेला, प्रोटोरिया, दक्षिण अफ्रीका' लिखा और टेलीग्राम भेज दिया। मुझे याद है 48 रुपये लगे थे, जो पढ़ाई के दिनों में अहमियत रखने वाली रकम थी, पर मंडेला तक पहुंचने  अपने को उनसे जोड़ने के जुनून में रकम की किसे सूझती ?  

उस दौर का सबसे बड़ा सपना था, अगर मुझे विदेश जाने का मौका मिले, मेरे पास इतना पैसा हो की बाहर जाऊं और चुनना हो तो सबसे पहले जिस देश की यात्रा करूंगा वह होगा 'दक्षिण अफ्रीका'. क्यों? क्योंकि वह मंडेला का देश है. स्वभाविक है, मंडेला से मिलना और उन्हें देखना, तो शायद किसी भी सपने के सच होने जैसा था। और वाकई जल्द ही यह मौका आ गया। मदीबा ने जेल से छूटने के बाद सबसे पहले जिन एशियाई देशों को अपने दौरे के लिये चुना था, उनमें भारत सबसे पहले नंबर पर था और भारत में भी वह दिल्ली के अलावा जिन शहरों में जा रहे थे, वे थे वाराणसी और कोलकाता.  

दिल्ली में भारत सरकार ने उन्हें तब तक के देश के सबसे सम्मानजनक, सर्वोच्च अलंकरण ' भारत रत्‍न' ( अब के दिनों की तरह नहीं की जिसे मन में आये उसे दे दो)  से सम्मानित किया था और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने उन्हें डी लिट् की उपाधि से सम्मानित कर खुद का मान बढ़ाया था. जाहिर है मंडेला भले ही तब तक दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति नहीं थे, पर विश्‍व नायक के रूप में स्थापित हो चुके थे और भारत सरकार ने उन्हें राजकीय अतिथि माना था. लिहाजा उनके एक - एक मिनट का कार्यक्रम तय था, ऐसे में उनसे निजी तौर पर मिलना तो दूर उनके कार्यक्रमों में पहुंचने के लिये भी निमंत्रण - पत्र की जरूरत थी. फिर मेरे जैसे पत्रकार को कौन पूछता, जब उनके कार्यक्रमों में शिरकत के लिये संपादकों तक के लिये अवसर सीमित थे।

मुझे याद है तब 'गांडीव' अखबार वरिष्ठ पत्रकार डॉक्टर राधा रमण चित्रांशी ने मदद की. उनके संपादक श्री राजीव अरोड़ा को मंडेला सर के दो कार्यक्रमों में बुलाया गया था। एक में, जिसमें उन्होंने मुझे जाने की अनुमति दी, वह था मेरे ही विश्‍वविद्यालय का डी लिट् समारोह।

क्या क्रेज था धरती मां के महान सपूत नेल्शन मंडेला का. सम्मान अलंकरण समारोह के बाद सब उन पर आटोग्राफ़ के लिये टूट पड़े। उस भीड़ में भी भारी धक्कामुक्की के बीच मैं अपने 'महा नायक' के पास पहुंच कर उनके हाथ में 'आटोग्राफ़ बुक' थमा चुका था, उन्होंने कलम मांगा, तब तक इस स्थिति से खीज चुके महाराजा बनारस विभूती नारायण सिंह ने हाथ पकड़ा और कहा, रहने दीजिये, तंग ना कीजिये। भला अपने आदर्श को कोई तंग कर सकता है?

किसी का भी आटोग्राफ़ लेने का वह मेरा पहला और आखिरी प्रयास था , वह भी असफल। पर आज जब विश्‍व नायक मंडेला हमारे बीच नहीं हैं, तब वह सारी बातें  फिर से जीवंत हो आई हैं। अपनी वही असफलता अब तक की सबसे बड़ी सफलता लगती है। पर जहां तक अपने आदर्श नायक की बात है, वाकई उनके जीवन में युद्ध आखिरी सांस तक खत्म नहीं हुआ।

फेस एन फैक्टस और जनता जनार्दन परिवार की ओर से महान मंडेला को श्रद्धांजली!
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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