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भ्रष्ट भारत और 15 अगस्त

भ्रष्ट भारत और 15 अगस्त चंद मछेरों ने साजिश कर सागर की संपदा चुरा ली
कांटों ने माली से मिलकर फूलों की कुर्की करवा ली
खुशियों की हड़ताल हुई है सुख पर तालाबंदी है
आने को आई आजादी मगर उजाला बंदी है

यह अगस्त है. देश की आजादी का महीना, पड़ोसी पाकिस्तान की आजादी का महीना। 'देश ' आजादी की 67 वीं वर्ष गांठ मना रहा है, पर उसके वासी महान कवि नीरज की उक्त पंक्तियों से परे नहीं सोच रहे, और यही कटु सत्य है.

आज 'लोक' पर 'तंत्र' हावी है. नेता, राजनेता बन 'सेवक' से 'स्वामी' की मुद्रा में हैं, जिन्होंने सियासत को 'सेवा' की बजाय 'सत्ता' के उस  प्रतिष्ठान्न में बदल दिया है, जहां नैतिकता, कौशल,  न्याय, बराबरी, समान अवसर, सिद्धांतों और मूल्यों की नहीं, मौकापरस्ती, भाई भतीजावाद, परिवारवाद ,चाटुकारिता, चालांकी और भ्रष्टाचार की चलती है .

उपकार फिल्म के एक गीत की पंक्ति लें तो, 'कसमें, वादे, प्यार, वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या.' ऐसा नहीं है कि ये तमाम खामियां भारतीय राजनीति में अचानक से आ गई और पहले नहीं थी, सच तो यह है की हमारी चरित्रगत यह खामियां सिर्फ सियासत ही नहीं बल्कि हमारे समाज का भी हिस्सा सदियों से थी, इतिहास और ग्रन्थ भरे पड़े हैं इनसे, पर इनकी बहुतायत इतनी ज्यादा कभी नहीं थी।

ये कमियां कभी संस्थागत नहीं हुई थी, व्यवस्था का हिस्सा नहीं थी, इनका महिमामंडन ऐसे नहीं हुआ था, ये इतना 'आम' नहीं थी की इनसे 'आम जन' इस कदर प्रभावित हो की उसे अपना 'आज' ही नहीं, 'कल' भी डूबता नजर आने लगे।

मुगलों और अंगरेजों को छोड़िये, अफगानों और छोटे-बड़े राजे-रजवाड़ों के शासनकाल में भी आम जन की ये दुर्दशा नहीं थी . अपील और दलील के मौके थे उसके पास, कहीं न कहीं, किसी न किसी लेवल पर सुनवाई थी उसकी, पर आज ...सच तो यह है की देशवासी, देश का आम 'जन' अब से पहले कभी इनसे इस कदर बेजार नहीं था.     
 
आज उसके पास रास्तों की कमी है, उसके पास विकल्प नहीं है. सियासी पार्टियां जनता की नुमाइंदगी करने की बजाय पारिवारिक प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां बन चुकी हैं, जो 'सियासत' की राह इस लिए चल रहे की  'सत्ता'  रूपी नोट छापने वाली मशीन पर कब्ज़ा कर अपनी दस - दस पीढ़ियों के लिए नोट बटोर सकें। '   नेता शब्द आज गाली बन चुका है . ऐसे में आम जन जाये तो जाये कहां, किससे फ़रियाद करे? है कहीं कोई सुनवाई ? बातें नहीं, यहां सिर्फ एक घटना बता रहा .

एयर फ़ोर्स से रिटायर हुए एक फ़ौजी परिवार की सच्ची घटना। मेरे एक जानने वाले हैं मिस्टर बनिक. जानबूझकर पूरा नाम नहीं दे रहा। एयरफोर्स में  नौकरी कर देश भर घूमते हुए देश की सेवा कर सर्विस के आखिरी सालों में यहीं दिल्ली एयर फ़ोर्स मुख्यालय से रिटायर हुए. रहने वाले सम्भवत: त्रिपुरा के. उनकी श्रीमती जी पश्चिम बंगाल की.

आमतौर पर फ़ौजी परिवारों में जैसा होता है, अगर माता - पिता न हों, संयुक्त परिवार न हो, तो जहां नियुक्ति हुई, वहीं जो लोग मिले, दोस्त बन गए। ट्रांसफर हुआ, दूसरी जगह गए तो फिर नए दोस्त, नया माहौल। उन्हीं में से कुछ लोग लंबे समय तक रिश्ता बनाए रह जाते हैं, बशर्ते रिटायर होने के बाद पुराने परिचित एक ही शहर या आसपास के इलाके में निवास करने लगें। 

पूरी जिन्दगी फ़ौज की सेवा में अनुशासनबद्ध जीवन जीने के बाद, बाहरी दुनिया, जिसमें हम लोग और आज के हमारे रहनुमा रहते हैं, आने के बाद नए परिवेश से तालमेल बिठाने में लगभग हर रिटायर्ड फौजी को थोड़ी दिक्कत जरूर होती है. मिस्टर बनिक उन्हीं में से एक थे.

हमारे उनके पारिवारिक संबंध बन गए थे, क्योंकि उनकी बेटी हमारे साथ बतौर पत्रकार काम करती थी।  वह रक्षा संवाददाता थी और लगभग सभी विषयों पर लिखती थी. बाद में एक भले  फ़ौजी अफसर से शादी कर उसने पत्रकारिता व् दिल्ली को विदा कह दिया, पर बनिक परिवार से हमारा रिश्ता बदस्तूर कायम रहा .

एयर फ़ोर्स छोड़ने के बाद भी मिस्टर एंड मिसेज बनिक को बाहरी दुनिया की कोई हवा नहीं लगी थी। अपने में मस्त। सीधे -सादे सरल लोग. ना काहु से दोस्ती, ना काहू से बैर. बेटी की शादी हो चुकी थी और दोनों बेटे नौकरी में थे. बड़ा साफ्टवेयर इंजीनियर था और छोटे ने ज्यादा पढाई नहीं की, पर एक बड़े शोपिंग प्लाजा में नौकरी कर रहा था .

बड़े को समाजसेवा की सूझी थी, और उसका समाज, उसका परिवार और  उसके सपने थे, लिहाजा उसने शादी  की उम्र हो जाने के बाद भी शादी नहीं की, पर छोटे वाले को नौकरी वाली जगह पर ही एक लड़की टकरा गई. वह लड़की और उसका भाई भी मिस्टर बनिक के छोटे बेटे की नौकरी वाले शोपिंग माल में ही काम करते थे.

बनिक जाति बंधन न तो जानते थे न ही मानते थे, शादी कहीं न कहीं करनी ही थी, सो जहां बच्चों की इच्छा. वैसे भी उस लड़की के मां - बाप नहीं थे. बनिक उसे बहु बनाकर परिवार में ले आये। उस शादी में मैनें भी सपरिवार शिरकत की थी. सब कुछ ठीक तो था, जल्द ही मिस्टर एंड मिसेज बनिक दादा- दादी बन गये.

पर बिना तैयारी के कम उम्र के नौजवानों में जैसा अकसर होता है, शादी के तुरंत बाद पेट में बच्चा आ जाने से पहले तो लड़की को नौकरी छोड़नी पड़ी,फिर पति दिन-रात की नौकरी के चलते बीवी को वह वक्त नहीं दे पा रहा था, जो एक साथ नौकरी करते, एक साथ आते- जाते और एक ही छत के नीचे रहते शादी के पहले साल के शुरुआती महीनों में पत्नी को मिल रहा था...  और यहीं से इस युवा जोड़े में शुरू हुई छोटी -मोटी तकरार. शादी के साल बीतते न बीतते मां - बाप बन जाने वाले इस युवा जोड़े की छोटी - मोटी नोंक -झोंक को बनिक परिवार ने ज्यादा तवज्जुह नहीं दी कि अचानक एक दिन मिसेज बनिक का रोते हुए फोन आया कि बहु ने पंखे से लटक कर जान दे दी .

उस दिन का वाकिया कुछ ख़ास नहीं था। बहु के भाई ने अपनी बहन से घर खरीदने के लिए एफडी  तोड़ कर कुछ रुपये देने को कहा . बहु ने अपने भाई को पैसे देने से मना कर दिया, इसी पर भाई -बहन के बीच फोन पर तकरार हो गई। बहु ने रात को  अपने पति को बताया,  पर बहन - भाई के संयुक्त दोस्त पति ने साले का पक्ष ही लिया। पत्नी रूठ गई और इतना रूठी की खुद की जान ले बैठी,   बिना अपने साल भर के भी ना हुए बेटे की परवाह किये, पति , सास -ससुर , जेठ , ननद का तो नंबर ही कहां आना था ? 

रो रहे मिस्टर बनिक और मिसेज बनिक को मैंने फोन पर ही सांत्वना दी और तुरन्त डॉक्टर, एम्बुलेंस, लड़की के घर वालों और पुलिस को सूचना देने को कहा . एक  डॉक्टर उसी अपार्टमेंट में थे , जिनके सहयोग से बहु को पंखे से उतरवा कर नीचे लिटा दिया गया। एम्बुलेंस आई और लौट गई.  लड़की के मायके  वाले भी आ गए, पर वाह रे उत्तर प्रदेश पुलिस, सुबह 7 बजे सूचना देने के बाद भी जब 8, साढ़े 8  बजे तक नहीं आई, तो मैंने अपने पत्रकार मित्रों की मदद ली . सम्भवत: उनके दबाव से आई पुलिस ने आते ही अपने रंग ढंग दिखाने शुरू कर दिये.

लड़के और उसके बड़े भाई को , जो उसी रात हास्पीटल से लौटा था, उठा कर पुलिस थाने ले गई .पूछताछ में जब इन्होंने उसके भाई के पैसा मांगने पर आत्महत्या की बात बताई, तो उसके भाई को डरा कर की इन्हें नहीं फंसाया तो तू खुद जेल  जाएगा, पुलिस ने बनिक के छोटे बेटे के खिलाफ तहरीर ले ली . एक दिन थाने में बिना किसी इंट्री के दोनों भाईयों को रखा और अगले दिन  पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ जाने के बाद पति को जेल भेज दिया।

 फिर उत्तर प्रदेश के कानून के मुताबिक सीओ ने जांच शुरू की. सीओ साहब तो नहीं पर उनकी जगह पर उनका कोई नुमाइंदा  रोज बनिक दम्पति को कभी सीओ की ऑफिस तो कभी थाने बुलाता और एक हफ्ते बाद यह कह कर की मैं जानता हूँ आप लोग निर्दोष हैं , मैंने लड़की के भाई को भी बुलाया है , पंचायत कराकर मामला रफा दफा करते हैं  आप सीओ ऑफिस आ जाइये . बेचारे बनिक दंपति , दुःख के मारे, एक साल के पोते को गोद में ले बड़े बेटे के साथ सीओ ऑफिस जब पहुंचे, तो कुछ देर के बाद पता चला की हफ्ते भर बाद सीओ साहब ने इन सभी के खिलाफ दहेज़ हत्या की तहरीर लिखवा दी है और इन सबको जेल भेज रहे हैं.  गोद के बच्चे को उन्होंने उसके मामा को दिलवा दिया. जिन्होंने केवल फिल्मों में या कृष्ण जन्माष्टमी की झांकियों में जेल देखी थी, वे खुद बिना अपराध के सचमुच की जेल में थे. 

मैं पत्रकार हूँ , वह भी देश की राजधानी दिल्ली में। काफी समय एक बड़े मीडिया समूह में संपादक रहा। उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में भी ठीक ठाक पकड़ है , मेरे एक मित्र जो अभी उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था के शीर्ष पर उत्तर प्रदेश पुलिस के महानिदेशक स्तर के  अधिकारी हैं से मदद मांगी, उन्होंने एसएसपी से बात की, पर राहत नहीं मिली। समूचा बनिक परिवार जेल में था। थाने के दलालों ने बताया, डीजी और मुख्यमंत्री नहीं साहब, महज 50,000  खर्चते तो एक के अलावा कोई दूसरा जेल न जाता, अब जमानत पर खर्चिये। जेल से पहले दिन ही किसी पैरोकार से फोन आ गया की जेल में मार पीटा न जाये, ज्यादा काम मतलब झाड़ू - पोंछा न लगवाया जाए, खाने को मिल जाये, सोने को कम्बल मिल जाए जैसे हर काम के लिए रुपये बंटे हैं, भेज दीजिये वरना बहु तो फंदे से मरी, बनिक यों मर जायेंगे। पैरवी का नतीजा मैं देख चुका था, सो रुपये भेजना मुनासिब लगा।

बनिक परिवार का कोई रिश्तेदार यहां नहीं था, फ़ोर्स की ईमानदारी की नौकरी में उनके पास पैसे भी नहीं थे. सो वकील से लेकर जमानत तक हर जगह मित्रों शुभेच्छुओं की मदद ली. पैसे और आदमी, कागजात और जमानत इन सबके लिए जूझते यह पता चला, थाना, जेल, कोर्ट हर जगह सिर्फ पैसा बोलता है, कचहरी में जमानती की सिर्फ वहीं की खींची ब्लैक एंड व्हाइट फोटो चलती है, क्योंकि फोटोग्राफर से पैसे मिलते हैं, जमानत हो जाने के बाद भी जिनके पास पैरोकार नहीं है, या जिसके पैरोकार ने मुहर्रिर की जेब नहीं भरी, वह महीनों जेल में है क्योंकि आजाद भारत की कोर्ट के पास जमानती के कागजात भेजने को 7-8 रुपये के पोस्टेज स्टाम्प नहीं हैं. जमानत और जमानती के बाद कोर्ट के पेपर जेल टाइम से पहुंच जायें, उसके लिए भी धन चाहिए .   

 ....अभी बनिक परिवार बाहर है. पूरे परिवार को सेशन कोर्ट और उनके छोटे बेटे को उच्च न्यायालय ने जमानत दे दी है. जिस मुख्य आदमी, इनकी बहु के भाई ने इनके खिलाफ मुक़दमा  लिखाया वह अदालत में हलफनामा देकर इनके निर्दोष होने की गवाही दे चूका है. पर इस बीच थाना, पुलिस, जेल और कोर्ट कचहरी के बीच बनिक परिवार की मदद करने के दौरान जो अनुभव हुए, वे आजाद भारत में भ्रष्टाचार के बीच पीस रहे आम आदमी की दशा को दर्शाने के लिए काफी हैं.

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कभी कहा था, जब तक समाज के आखिरी आदमी तक आजादी की रोशनी न पहुंचे तब तक वह अधूरी है. इन हालातों का जिम्मेदार कौन है? देश और उसकी आजादी को सलाम करने के साथ इस का उत्तर भी खोजिए, मिल जाए तो हमें भी बताइयेगा. सत्ता और बहुमत के नशे में मस्त हुक्मरान देश को नारों व वादों के भ्रम में रख तो रहें हैं , पर कब तक ...बनारस के एक कवि के शब्द में : "हर आदमी परेशान हौ, हर आदमी पस्त हौ, मारा पटक के जे कहे 15 अगस्त हौ." यह अतिवाद हो सकता है, पर शाइनिंग इंडिया से भारत निर्माण तक एक आम आदमी का दर्द, उसकी भावनाएं और सचाई इससे परे नहीं. 

जय हिन्द !
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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