आगत! तुम्हारे स्वागत का मन नहीं

आगत! तुम्हारे स्वागत का मन नहीं  'प्रेम निर्झर बह गया है, रेत सा तन रह गया है !' पता  नहीं क्यों 'आगत का स्वागत है' की सांसारिक, संस्कारगत और प्राकृतिक बाध्यता को स्वीकारने का दिल नहीं कर रहा। एक रस्म अदायगी भर है यह नया साल और उसका स्वागत। 2013  इस तरह से आएगा, इतनी घनी उदासी और धुंध के साथ इसकी उम्मीद नहीं थी। ऐसा क्या है जिसका हम स्वागत करें। मेरे नजरिये से बीते साल 2012 ने देश और दुनिया भर में तरक्की के बीच जो सबसे बड़ी चीज हमसे छीनी वह इनसानियत थी। आखिर कोई अपने अतीत से पीछा पाये भी तो कैसे? वैसे भी यह अतीत नहीं, हमारा बीता कल है ! शायद वह भी नहीं, हमारा आहत वर्तमान है, जो हमारे साथ -साथ चल रहा।

अगर 2012 तक हजारों साल की धार्मिक, लौकिक, संस्कारिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, सामाजिक और आध्यात्मिक तरक्की और विज्ञान की नई खोजों और सभ्यता के विकास के बावजूद पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक, और चन्द्रमा और मंगल तक अपने रॉकेट पहुंचा देने, सूचना क्रांति के दौर में पल भर में एक दूसरे तक पहुंचने की अपनी कूबत के बावजूद  अगर आदमजात अभी तक ठीक से ' इनसान ' भी नहीं बन पाया है, तो नए का स्वागत किस मुंह से ? किस और कैसे कल की आस धरें, और वह भी किस उम्मीद पर ! कहते हैं संवेदनाएं आज के दौर में मुरखता की निशानी हैं, पर जरा कल्पना भर तो कर के देखिए, बिना  संवेदनाओं के जीवन क्या और कैसा होगा ?

बिगत साल के आख़िरी महीने की केवल दो ही तस्वीरें यहाँ काफी होंगी। एक अमेरिका की और एक अपने देश ' महान'  भारत की। अमेरिका के न्यू टाउन के सैंडी हूक एलीमेंट्री स्कूल में 14 दिसंबर को जब पहली से लेकर 5 वीं क्लास के बच्चे रोज की तरह अपने खिलंदडेपन और बचपने की मस्ती के बीच पढाई -लिखाई  के साथ आने वाली क्रिसमस की छुट्टियों की उमंग में डूबे थे कि एडम लांजा नामक 20 साल के एक नौजवान ने ताबड़तोड़ गोलियां चला कर कुल 27 लोगों को छलनी कर दिया, जिसमें 20 तो केवल स्टूडेंट थे , इनमें भी 11 की उम्र तो केवल 4 से 12 साल के बीच थी।

क्या था इन मासूमों का अपराध? ये तो एडम लांजा को जानते तक न थे? इन्होंने न तो लांजा का कुछ बिगाड़ा था, न ही समाज में किसी से इनकी अदावत थी। एक पूरा जीवन, खिलखिलाता बचपन, बेपरवाह यौवन, जिम्मेदारी भरी प्रौढ़ावस्था, शादी -ब्याह, पति-पत्नी, बाल-बच्चे, बहु-सास, पिता-श्वसुर, दादा -दादी न जाने कितने रिश्ते और कैरियर के  कौन-कौन से पड़ाव देखने और जीने थे इन्हें, इनमें से कोई इंजीनियर बनता, कोई डॉक्टर, तो कोई व्यापारी,कोई अंतरिक्ष यात्री बन सकता था तो कोई पादरी, ये कुछ भी हो सकते थे, पर जीवन शुरू होने से पहले ही ...जिस एडम लांजा ने 4 से लेकर 56 साल के 27 लोगों को मार कर खुद की जान भी ले ली, उसने सबसे पहले घर में अपनी जीवनदायिनी माँ को मारा था।  

लांजा के दिमाग  में क्या चल रहा था? उस पर इस कदर पागलपन क्यों सवार था, अपनी इस हरकत से वह क्या हासिल करना, जताना और बताना चाहता था, उसके न रहने से  यह मौका भी चला गया, पर अगर हम लांजा की मानसिक स्थितियां जान भी लेते तो जो असमय चले गये , या लांजा के सनकीपन ने जिनसे जीवन छीन लिया उन्हें लौटाया तो नहीं जा सकता था।  न्यू टाउन हादसे की इस दुखद खबर को जनता जनार्दन और उसके अंगरेजी की सहयोगी साईट  www.facenfacts.com  पर लगाते हुए, पीड़ित परिवारों के दुःख और उन नन्हें नौनिहालों के बचपन की बातें पढ़ मन किस किस कदर से कितनी बार भीगा, बताना मुश्किल है। और इससे उबरते कि अपने देश की राजधानी दिल्ली में हैवानियत को भी शरमाने वाली  एक घटना घट गई।  

16 दिसम्बर को दिल्ली में 23 साल की एक युवती, जिसने हाल ही में मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर राजधानी के ही एक हास्पिटल में प्रशिक्षु के तौर पर काम शुरू किया था, और जिसकी कुछ ही दिनों में अपने दोस्त से सगाई होने वाली थी,  अपने उसी दोस्त के साथ दक्षिणी दिल्ली के एक माल से शाम का शो देख रात के 8.30 बजे घर वापसी की कोशिश में बस स्टैंड पर खडी हो सवारी वाहन का इंतज़ार कर रही थी, तभी दिल्ली सरकार के परमिट पर प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को लाने - ले जाने वाली व्हाइट लाइन बस वहां पहुंची और लड़की और उसके दोस्त को उनके गंतव्य स्थल तक पहुंचाने वाली सवारी बस बता कर बैठा लिया।

बस में उस समय इस लड़की और लडके सहित कुल 8-9 लोग सवार थे। बस कुछ ही आगे बढ़ी थी की बस में सवार 18 से 26 साल के लंपटों ने लड़की पर पहले तो फब्तियां कसनी शुरू की और फिर छेड़खानी करने लगे, विरोध करने पर लड़की के साथ-साथ उसके साथी की भी लोहे के राड से पिटाई की गई, और फिर शुरू हुआ लड़की के साथ हैवानियत का सिलसिला, एक-एक कर बस में सवार कंडक्टर, ड्राईवर, खलासी और उसके साथियों सहित, कुल मिलाकर 6 लोगों ने लड़की के साथ न केवल बहशियाना बलात्कार किया, बल्कि हैवानियत की सारी हदें पार कर दी। लड़की के नाजुक अंगों में लोहे की राड दाल दी गई और लगभग मरणासन्न हालत में उसे उसके दोस्त के साथ सड़क के किनारे मरने के लिए फेंक दिया गया।  

यह तांडव हुआ देश की राजधानी में, उन सडकों पर जिस पर देश के भाग्यविधाता, मंत्री, प्रधानमंत्री, सांसद, विधायक, लोकसभा- राज्यसभा अध्यक्ष, चांसलर, वकील,  शिक्षाविद, न्यायाधीश और सेना प्रमुख गुजरते हैं।  लगभग तीन घंटे तक चलती बस में देश की एक बेटी की अस्मत और जिन्दगी लुटती रही, और हमारे महान भारत की हरदम, हमेशा आपके साथ रहने वाली पुलिस को हवा तक नहीं लगी, जबकि   इस दौरान वह बस ने कम से कम आधा दर्जन पुलिसिया बैरिकेड पार किए और दिल्ली के 4-5 महत्त्वपूर्ण पुलिस थानों से होकर गुज़री।  

इस हादसे के आगे और भी शर्मनाक घटनाएँ जुडी। जब उस लड़की को इन्साफ दिलाने और दोषियों को सख्त से सख्त सजा दिलाने की मांग पर देश की नौजवान पीढ़ी ने इंडिया गेट पर जुट कर शांतिपूर्ण ढंग से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से मिलकर अपनी बात रखने की कोशिश की तो, राजधानी की दांत कंपकंपाती ठंड में उन पर पानी की बौछारें और  लाठियां बरसाई गईं , जब लोग इससे भी नहीं भागे तो उन पर अश्रु गैस के गोले छोड़े गए। सरकार और जनता अलग-अलग छोर पर खड़े हो गए। इस बीच देश की वह लाडली बेटी जीने की अपनी असीम जिजीविषा के साथ दिल्ली के एक अस्पताल में जीवन और  मृत्यु के बीच जूझती रही। देश के प्रधानमंत्री को अपनी जबान खोलने में पूरे हफ्ते भर लग गये, यही हाल राष्ट्रपति महोदय का था, जो 5 से भी ज्यादा दशक तक  खुद सामाजिक और सियासी जीवन से गुजर कर महामहिम बनें हैं।  

जब समूचा देश उस बेटी को ' दामिनी', 'निर्भय' और 'अमानत' कह उसके हक़ में, और उस जैसी दूसरी मां, बहन, बेटियों के लिए इज्जत और इन्साफ मांग रहा था तब महामहिम के बेटे, जो खुद भी सांसद हैं, ने 'दामिनी' के हक़ में किये जा रहे आन्दोलन को दिशाहीन छात्रों और लिपस्टिक पुती महिलाओं का आन्दोलन करार दिया था। लोगों का गुस्सा जब इन सब बातों से ज्यादा भड़का तब प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति सहित देश की सुपर आलाकमान सोनिया गांधी के मुखार बिंदु  खुल गए। पर इन सबसे 'दामिनी' को बचाया नहीं जा सका। सरकार ने उसे इलाज के लिए सिंगापुर भेजा, पर तब तक काफी देर हो चुकी थी। 29 दिसंबर को देश की उस अनाम बेटी ने सुदूर धरती पर आख़िरी सांसें छोड़ दी। देश का कानून देश की उस बहादुर बेटी का नाम उजागर करने की इजाजत नहीं देता, पर उसके जाने से जिस तरह के क्षोभ और न्याय के पक्ष में खड़े होने की अलख समाज के हर तबके में जगी है, अगर वह अंजाम तक पहुंच सके  और यह देश महिलाओं को सही मायने में सम्मान और बराबरी दिला सके, तो शायद 'दामिनी' के प्रति हुए अपराध से कुछ हद तक ही सही समाज को क्षमा मिल जाएगी। अपराधियों को उनकी करनी के यथोचित दंड पर क्या कहना?
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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