Thursday, 17 October 2019  |   जनता जनार्दन को बुकमार्क बनाएं
आपका स्वागत [लॉग इन ] / [पंजीकरण]   
 

...तो गांधीवादी और कौन है?

...तो गांधीवादी और कौन है? 'जिन्दगी इत्तिफाक है, कल भी इत्तिफाक थी, आज भी ...' बचपन से ही सुनते आ रहे इस गीत की भावभूमि यों तो बिना किसी व्याख्या के भी समझ में आती रही है, पर ऐसा कोई इत्तिफाक मेरे साथ भी घटेगा, कम से कम इसका ख्याल मुझे तो नहीं था. आता भी कैसे? एक बड़े पत्रिका समूह में प्रशिक्षु से शुरू कर अप्रैल २०१० के पहले के १४ सालों में पत्रकार, संपादक, प्रबंधक और अखबार मालिकों की सियासत में चक्करघिन्नी की तरह यों उलझा रहा कि मशीनी मानुष की तरह सिर्फ वही दिखा जो बड़े करीने से अन्दर फीड किया गया था, कि संसार 'संयोगों' का नहीं, सिर्फ एक व्यवस्था का प्रतिरूप है, जिसे सक्षम लोगों ने अपने हिसाब से गढ़ रखा है.

... और सक्षम कौन है, वह जिसके हाथ सफलता है, जिसके पास पैसा है, और जिसकी लोग सुनते हैं. मुझे भी लगता था, शायद यही सच है, वाकई ऐसा था भी. उस समूह की पत्रिकाएं बहुत बिकती थीं, विज्ञापनों से पैसा बरस रहा था, मालिकान अखबारी दुनिया के बड़े लोगों में उठने- बैठने लगे थे, और संस्थान के अन्दर-बाहर मेरा पाला सिर्फ उन्हीं लोगों से पड़ता था जो या तो मेरी सुनते थे, या जो मुझे सुना सकते थे. सुनने वालों की जमात का प्रतिशत ९० था तो सुनाने वाले बमुश्किल ४. बाकी ६ प्रतिशत में मेरे दोस्त और वे करीबी थे जो सुन और सुना दोनों ही सकते थे. और जब मुझे यह लगने लगा था की संस्थान और मैं एक - दूसरे के पूरक हैं, तभी हालात ऐसे बने की नौकरी छोड़नी पडी. फिर ड्रीम प्रेस कंसल्टेंट्स, www.facenfacts.com और जनताजनार्दन का यह दौर. शुद्ध ईमानदारी से जिस देश में जिन्दा रहना भी किसी चुनौती जैसा हो, वहां बिना किसी बैकिंग और बड़े पूंजी निवेश के अपना काम स्थापित करना, कर पाना...सो यहां भी २४ घंटों की व्यस्तता.                        

ऊपर का अपने से जुड़ा अब तक का वाकया सिर्फ यह बताने की गरज से था कि, पढाई के बाद के १६-१७ सालों में अपने लिए कभी इतना वक्त मिला ही नहीं की इत्तिफाकों की हकीकत से रूबरू हुआ जा सके. इसीलिये जब अपने नन्हें राजा अदित के बुलावे पर हम विलिंग्टन डिफेन्स स्टाफ कालेज पहुंचे, तो यह पिछले २ दशकों के बीच की संभवत: पहली छुट्टी थी. दिल्ली की आपाधापी, भागदौड़ और तनाव से अलग. बनावटी मुस्कराहटों और सियासी चालबाजियों से अलग, व्यावसायिक कुटिलताओं और स्वार्थी छलछद्म भरे माहौल से अलग.

एक अलग ही दुनिया, हरी भरी , खुशनुमा और जिंदादिल. अपनापे, आदर और प्यार से ओतप्रोत, निश्छल रिश्तों की ऊष्मा से लबालब, प्रकृति के निःसीम सौन्दर्य से सराबोर. विलिंग्टन, कुन्नूर, ऊटी, कोच्ची, अलेपी और कोयम्बटूर. ५ दिनों में दक्षिण भारत की खुबसूरत सरजमीं का जितना हिस्सा देख पाया उसे शब्दों में दिखाना संभव नहीं, और शायद इसीलिये यहां मैं अपनी इस यात्रा और अपने जीवन से जुडी इन बातों का जिक्र करता भी नहीं अगर यह 'इत्तिफाक' घटता नहीं. कोयम्बटूर विमान तल पर सिक्योरिटी चेक के बाद जब अपनी बारी  के इंतजार में बैठा था तो दूर नजर एक जाने -पहचाने चेहरे पर पड़ी, जिनसे कभी मुलाकात तो नहीं हुई थी, पर जिनके सैकड़ों स्तम्भ हिंदुस्तान टाईम्स  में पढ़े थे, जिनमे से कुछ तो हमेशा -हमेशा के लिए दिमाग पर चस्पां हैं. खासकर आज के बदलते सियासी परिवेश पर, 'ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है' या फिर उपराष्ट्रपति के कद और पद की गरिमा को स्थापित करने वाला उनका हालिया लेख.

लगा अरे ये तो गोपाल कृष्ण गांधी सर हैं. ( क्षमा करेंगे, यहां सर लिखा एक खास तरह के जुड़ाव के चलते, जिसका जिक्र अभी आगे करूंगा) अभी तो पिछले दिनों ही वे चर्चा में थे, ३० से भी कम दिनों में दो बार. २०१२ में एक बार राष्ट्रपति पद के लिए उनका नाम चला, दूसरी बार उपराष्ट्रपति पद के लिए. पिछले चुनाव में भी इस संवैधानिक पद के लिए उनकी चर्चा हुई थी. माना की यह उनका खुद का प्रयास नहीं था और अपने महानतम पूर्वज और गरिमामय अतीत के मान स्वरुप उन्होंने रेस में शामिल होने से मना कर दिया था. भले ही इन पदों के लिए चले उनके नाम को पश्चिम बंगाल की करिश्माई, जुझारू नेता ममता बैनर्जी की एकतरफा पहल करार दिया जाये, जिसे सियासी शतरंजबाजों ने अपने माकूल न पाकर परवान नहीं चढ़ने दिया, पर जितने भी नाम चर्चा में थे, उनमें श्री गांधी एक बेहद सम्मानित और संजीदा नाम हैं, इससे किसे गुरेज हो सकता है ?

हमने अंगरेजी में www.facenfacts.com पर और हिन्दी में जनताजनार्दन पर इस दौरान खूब खबरें भी लगाईं थीं और गोपाल कृष्ण गांधी की ताजा फोटुयें भी छापीं थीं, इसलिए उन्हें पहचानने में देर होने का सवाल ही नहीं था, पर अपनी आंखों पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल हो रहा था. मैं उत्तर प्रदेश का रहने वाला, उस पर सियासी रूप से थोड़े जागरूक परिवार का. घर शेरशाह शूरी मार्ग पर. सो बहुत बचपन से ही नेताओं और अफसरशाहों के जलवे देखें हैं. आजकल तो और भी. पूर्वी उत्तरप्रदेश के सांसद , विधायक, पूर्व सांसद , पूर्व विधायक तो दूर , पंचायत प्रमुख और पार्षद तक २-२ , ४- ४  कारों पर घूमते हैं. फिर इनमें कहीं कोई पूर्व मंत्री बन गया तो फिर क्या? जीवन भर कारों के काफिले और जलवों का सिलसिला. एयर पोर्ट गए तो व्यवहार ऐसा जैसे  वीआईपी लाउंज में पैदा ही हुए थे, क्या मजाल की हवाई जहाज की कोई भी सेवा उन्हें आम आदमियों के साथ बुलाकर विमान में बिठा ले, लाइन में लगा सिक्योरिटी चेक करे, या फिर वे आम इंसानों की पंक्ति में खड़े हो विमान में चढ़ने के लिए अपनी बारी का इंतजार करें ! इसी तरह अफसरान. अगर कोई तहसीलदार और थानेदार से ऊपर के पद पर रहा, तो ताउम्र उसके रूतबे में कमी नहीं होती. चमचों की फ़ौज, गाड़ियों की भरमार. मैं तमाम ऐसे पीसीएस अफसरों को जानता हूँ , जिन्होंने साईकिल से शुरू तो किया था, पर आज इतना रूपया कमा चुके हैं कि अगर सरकारी कोड़े का भय न हो तो हवाई जहाज खरीद लें.

सो गांधी सर को पहचानने के बावजूद हिचक होना लाजिमी था. सिक्योरिटी चेक के बाद एयर पोर्ट पर आम जनों के लिए बनी सीटों में से एक पर वे इतने सौम्य ढंग से बैठे थे कि साथ के सहयात्री को आभास भी न हो सके की उसके पास कौन बैठा है! कम से कम मेरे लिए तो अपनी तरह का यह केवल दूसरा अनुभव था. पहली बार जब भुबनेश्वर में लगभग २० -२१ साल पहले श्री किशन पटनायक से उनकी श्रीमती वाणी जी के घर पर मिला था, तो उनकी सादगी देख आभास ही नहीं हुआ की मैं अपने ज़माने के सबसे युवा सांसद या उस समाजवादी गुरु से मिल रहा हूँ , जिनके भटके शिष्यों में से आधे ने आधे हिन्दुस्तान पर राज करना सीख लिया है. और फिर इतने सालों बाद यहां कोयम्बटूर एयर पोर्ट पर.

थोड़ी सी उधेड़बुन के बाद गांधी सर के पास पहुंचा और उनके साथ पहले काम कर चुके और वर्तमान में राज्यसभा सचिवालय के संयुक्त सचिव अपने मित्र सत्य नारायण साहू का हवाला देते हुए अपना परिचय दिया. बताया की आपके बारे में इतनी बार श्री एसएन साहू से चर्चा हुई है,  इसके अलावा पश्चिम बंगाल में  संवैधानिक पद की गरिमा को बरकरार रखते हुए आम जनता के हक़ में किये गए आपके प्रयासों से इतना प्रभावित रहा हूँ, और फिर अंगरेजी अखबार में आपके लेखों, स्तंभों को पढ़ आपके बारे में इतना कुछ जानता हूँ, कि चाहता हूँ की आपके जीवन और विचारों के तमाम पहलू हमारे पाठकों तक भी पहुंचें, और इसलिए जब कभी आप दिल्ली आयें तो साक्षात्कार के लिए थोड़ा वक्त निकालें, यह भी बताया की रास्ते में मैं यह जिक्र कर ही रहा था कि माननीय बापू 'महात्मा गांधी' अगर जनमानस में इस कदर जिन्दा न होते की उनका नाम भर सत्तानसीनों के लिए आदर भर दे, तो अब तक सियासी दावपेंचों में भारतीय मुद्रा पर से भी बापू की फोटुयें हट चुकी होतीं. चूंकी बापू की स्वीकार्यता उन्हें न मानने वालों में भी है, इसलिए भारतीय रुपयों में बापू अभी भी मौजूद हैं.

श्री गांधी का जवाब था,  जय प्रकाश जी मेरा सौभाग्य की आप से मुलाकात हुई. पर मैं  ऐसा नहीं की मेरा साक्षात्कार लिया जाये. आप बहुत महान और सक्षम लोगों का नाम ले रहे. मैं तो किसी भी तरह से गांधीयन नहीं हूँ. आपसे मिलूँगा जरूर पर मैंने ऐसा कोई काम नहीं किया की साक्षात्कार दूं. मैंने वही किया जो मेरी जगह कोई और भी होता तो करता. लेखन भी मैं अपनी आजीविका के लिए करता हूँ. मैं क्या कहता? सोचा ये बातें आप से शेयर करता हूँ, गोपालकृष्ण गांधी जी के कार्यालयीय परिचय के साथ, केवल इस उम्मीद से कि आखिर देश की जनता को भी पता लगे की महात्मा गांधी जी की विरासत अब भी उनके वारिसों के साथ जिन्दा है न कि उनके नाम पर राज करने वालों के पास.

गोपाल कृष्ण गांधी. जन्म २२ अप्रैल १९४५. पिता - श्री देवदास गांधी. (राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सबसे छोटे बेटे, जो आख़िरी वक्त तक बापू के साथ रहे ). मां- श्रीमती  लक्ष्मी  गाँधी, ( चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की बेटी).  १९६८ से १९९२ तक बतौर आईएएस  अफसर तमिलनाडु राज्य में विभिन्न पदों के अलावा उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति कार्यालय में सचिव, संयुक्त सचिव. १९९२ में सेवा निवृत्ति के बाद और २००४ में पश्चिम बंगाल के गवर्नर बनने से पहले ग्रेट ब्रिटेन में भारतीय दूतावास से जुड़े कई पदों पर.  दक्षिण अफ्रीका, नार्वे एंड आइसलैंड , लेसोथो, श्रीलंका में भारत के राजदूत रहने के अलावा राष्ट्रपति के आर नारायणन के सचिव भी रहे. साल २००६ में उन्होंने बिहार के राज्यपाल का अतिरिक्त कार्यभार भी सम्हाला था. फिलहाल भी वह इन्डियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस स्टडी के अध्यक्ष हैं. आज भी गूगल सर्च पर गोपाल कृष्ण गांधी नाम टाईप करने पर १० लाख ३० हजार और याहू सर्च पर १३ लाख १० हजार पेज खुलते हैं.

गोपाल कृष्ण सर , मैंने बापू पर इतना नहीं पढ़ा कि दावे से कुछ कह सकूं, बड़े -छोटों के लिहाज की हमारी संस्कारगत मर्यादा भी आपके कहे पर अविश्वास और आपसे सवाल की इजाजत नहीं देती, पर आप को अब तक जितना जान समझ पाया हूँ, उससे आपसे तो नहीं, पर इस स्तम्भ के अपने पाठकों से इतना जरूर पूछ सकता हूँ कि फिर गांधीवादी आखिर कौन है?
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

वोट दें

क्या विजातीय प्रेम विवाहों को लेकर टीवी पर तमाशा बनाना उचित है?

हां
नहीं
बताना मुश्किल
 
stack