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सोचना तो होगा

सोचना तो होगा देश की आबो हवा में एक अलग सी सरगोशी है. देश आजादी का ६६ वां जश्न मना रहा है और तमाम सियासी आपाधापी, खामियों, चोरियों और बेईमानियों के बाद भी महान भारत का लोकतंत्र मजबूत हुआ है. लालकिले पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के राष्ट्र को संबोधित करने का सिलसिला बदस्तूर जारी है,लगातार ८ वें साल. कागजों पर भारत चमक रहा है , कुछ वैसे ही जैसे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के राज में 'शाइनिंग इंडिया'के नारे के बीच चमक रहा था. देश के गावों में तब भी १८ घंटे बिजली नहीं आती थी, आज भी आलम वही है.

देश 'अनेकता में एकता, हिंद की विशेषता'के खामखयाली किताबी नारों के बीच जितना तब बंटा था आज उससे कहीं ज्यादा बंटा है. देश के उगते बिहान में चमकते सूरज को  काली घनघोर घटाओं ने बहुत गहरे तक ढंक रखा है. ऐसे में न तो हमारे नए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का आजादी की पूर्व संध्या पर दिया गया राष्ट्र का पहला संबोधन कोई विश्वास जगाता है, ना ही लालकिले के प्राचीर से प्रधानमंत्री के आश्वासन कोई उम्मीद जताते हैं.  

आखिर क्या हो गया हमारे लोकतंत्र को ? किसकी नजर लग गयी हमें? कहीं तो कुछ ऐसा है, जो हमसे हमारे आजादी के मायने छीन रहा है, हम वह हासिल नहीं कर पा रहे जिसका सपना अपने को कुरबान करते वक्त हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था. कहने को अपने पड़ोसियों की तुलना में हम ज्यादा खाते - पीते लोग हैं, ज्यादा खुशहाल और ज्यादा आज़ाद  हैं , पर इन सबके बीच बापू के सपनों का भारत कहाँ है? कहां हैं वे नेता, वे अगुआ जिनके लिए भारत रत्न लता मंगेशकर ने कभी गाया था,'ए मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी ...'   यह गीत केवल सेना और सेनानियों के लिए ही नहीं था. इनमें वह सब शामिल थे, जिन्होंने देश की आजादी के लिए, उसकी सुरक्षा के लिए, देश के बेहतर कल के लिए, अपना आज कुर्बान कर दिया. आजाद भारत की सेना आज भी उतनी ही मुस्तैदी और देशभक्ति की भावना से रत सीमाओं पर टिकी है, पर हमारे अगुआ ...

सच कहें तो एक भी नजर नहीं आता. अन्ना हजारे अपने आन्दोलनों में जब देश के दूसरी आजादी की बात करते थे, तो मन को केवल इसलिए सुहाता था की कहीं न कहीं वे ' लोक ' की बात करते थे , जिसे आजादी के बाद आगे बढ़ा 'तंत्र ' खा गया था. पर अन्ना हजारे के भी अगस्त २०११ के आन्दोलन और जुलाई २०१२  के आन्दोलन में अंतर था. २०११   में जब वह रामलीला मैदान में बैठे थे तो अन्ना के साथ ही उनकी टीम भी पाक साफ़ दिखती थी. इसीलिये समूचा देश , नई पीढ़ी अन्ना के आन्दोलन के पीछे खड़ी हो गयी, नतीजा 'लोक' के सामने 'तंत्र 'घुटने टेक गया. वह 'तंत्र' जो 'लोक ' के दम पर, उसके 'मत' से मिलकर लोकतान्त्रिक व्यवस्था के सबसे मजबूत पायों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को गढ़ता है, और जिसके सर्वोच्च शिखर का नाम 'संसद' है, और जिसके नुमाइंदे तथाकथित 'माननीय' सांसद सत्ता के दंभ में जनता और जनमत की संयुक्त ताकत को भुला बैठे थे, जन आन्दोलन के सामने घुटने टेक गए. लगा 'लोक' आजाद भारत में देर से ही सही 'तंत्र' पर भारी पड़ गया, जीत गया... पर यह सिर्फ तात्कालिक था.

महज एक साल में नजारा बदल गया. अन्ना को छोड़ उनकी टीम में एक -एक कर लोगों की कलई खुलने लगी, अन्ना हजारे को छोड़ बाकी टीम अन्ना की विश्वसनीयता शक और सुबहा के घेरों  में आ गयी, किसी को महत्त्वाकांक्षा  की बीमारी लगी थी, तो किसी के दामन पर बेईमानी के दाग थे. जनता  को जब नाग नाथ और सांप नाथ में से ही किसी एक को चुनना है तो उसके लिए वे क्या बुरे हैं जो धर्म, जाति, मजहब,  क्षेत्र, दल के नाम पर या फिर पैसे लेकर उनका काम कर करा देते हैं...

देश आज फिर वहीं खड़ा है. बंटवारे की राह पर. यह बंटवारा देश, जगह और राज्य का ही नहीं, मन , मत और मजहब का है, वर्ग का है. आजाद भारत में लोकतंत्र ने सबको सामान हक़ और बराबरी तो दी , पर आगे बढ़ने के लिए सबको समान अवसर नहीं दिए. हमारी समूची व्यवस्था, सक्षम लोगों की दासी बन गयी और सक्षमता का पैमाना बन गया 'पैसा'. गांधी के नाम पर चलाये जा रहे गांधी छाप नोट जिसकी जेब में जितने ज्यादा, वो उतना सक्षम. क्या आज हम बिना पैसों के किसी के नेता बनाने की उम्मीद कर सकते हैं, अन्ना को भी महाराष्ट्र के अपने गांव से दिल्ली पहुंचने के लिए पैसों की जरूरत पड़ती है.  नतीजा हर कोई पैसा कमाने में जुट गया है. आपकी जेब में पैसे न हों तो आपकी कोई पहचान नहीं, आप चुनाव में देश की अगुवाई का सपना तो छोड़िए, अपना घर तक नहीं चला सकते.शायद इसीलिये ईमानदारी आजकल बेवकूफी का पर्यायवाची समझी जाने लगी है...और इस सोच को इस मान्यता को बल दिया है, हमारे आज के लोकतंत्र ने, हमारे नेताओं ने, हमने आप ने.   

देश की तरक्की के खोखले नारों के बीच अगर अमीर और गरीब के बीच की खाई नहीं पाटी गयी, गांव की बजबजाती गलियों और शहर की चमचमाती सड़कों के बीच का फासला कम नहीं किया गया, अगर यह नहीं देखा गया की इस  व्यवस्था में कैसे, कब और क्यों कोई कांडा, राजा, गौड़ और चड्ढा, चप्पल बेचते, सड़क पर चलते, ठेकेदारी करते और दूध बेचते करोड़ों ही नहीं, अरबों- खरबों कमा लेता है, कैसे कोई प्राइमरी स्कूल का मास्टर या मास्टरनी सांसद, विधायक , मंत्री, मुख्यमंत्री बनकर अपनी एक पीढ़ी ही नहीं अपनी १०० पीढ़ी तक के लिए नोटों की झोली भर लेता है  और उसी बीच कोई कतवारू, रामहरख, सूबेदार और रामचंदर दिन रात की मेहनत मजदूरी कर के भी अपने और अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी , ढंग के कपड़ों और सम्मान की जिन्दगी तक नहीं, जुटा पा रहा, जुटा पाता है, तो उसके लिए आजादी के मायने क्या हैं?

देश के लगभग ११५ करोड़ लोगों के लिए स्वतंत्रता दिवस राजमर्रा की जिन्दगी से कोई खास अलग नहीं. यहां तक की कुछ के लिए तो जश्ने आजादी की छुट्टी उनके भूखे रहने की वजह तक है. आज भी दिल्ली में सड़क के किनारे कचरे के ढेर से प्लास्टिक के थैलों को चुनते हुए सरवन मिला था. उसके लिए जश्ने आजादी मतलब.... बनारस के एक कवि के शब्दों में कहें तो- हर अदमी परेशान ह, हर अदमी पस्त हौ , मारा पटक के जे कहत १५ अगस्त हौ !

दोस्तों ! जश्ने आजादी की  ६६ वीं सालगिरह मुबारक, इस उम्मीद से की वो सुबह कभी तो आयेगी. १५ अगस्त २०१२ की हार्दिक बधाई.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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