Thursday, 12 December 2019  |   जनता जनार्दन को बुकमार्क बनाएं
आपका स्वागत [लॉग इन ] / [पंजीकरण]   
 

इसे क्या कहेंगे ?

इसे क्या कहेंगे ?  देश में मीडिया वालों के बीच आपस में एक दूसरे के खिलाफ न छापने का एक अलिखित समझौता सा है, जिसे नैतिक व्यापारिक सदाचार की संज्ञा दी जाती है, पर मामला जब देश का हो, तो व्यापार और सदाचार से बड़ा देश होगा ही ,खास कर हम जैसे लोगों के लिए,जिन्होंने सुविधा,पैसों और तरक्की की होड़ में अपना ईमान बचा कर रखा है. काम की व्यस्तता कहिये, समय की कमी, न लिख पाने की काहिली या फिर व्यावसायिक अप्रतिबद्धता, पर समय से यह कालम नहीं लिख पा रहा हूँ. जब पत्रिका की नौकरी में था, तो कवर स्टोरी का कर्तव्य हर पखवारे नैतिक रूप से निबाहता था. यहाँ अपना काम है, तो ...

अन्ना का इतना बड़ा आन्दोलन हुआ, लोकपाल और भ्रष्टाचार पर देश भड़का, जगा, संसद बैठी, बड़े-बड़े  वादों, बातों के बीच देश के हित की बात हुई और अन्ना के जिस आन्दोलन को बड़ी ताकत मिली थी, जिसने इतिहास रचा था, और जिससे देश की, हमारे कल की, आने वाली पीढी को दशा-दिशा मिलनी थी, वह तुच्छ सियासी साजिश का शिकार हो गया और हथियार बनी, देश की सबसे बड़ी चौपाल 'संसद'. शायद इसीलिये गांधीवादी समाजसेवी अन्ना हजारे ने जब मुम्बई में धरने का ऐलान किया, तो ज्यादा लोग नहीं जुटे. नेताओं ने माना, वे जीत गए और अन्ना चुक गए, पर दरअसल ऐसा कुछ हुआ नहीं था. देश का युवा यह जान चुका था की उसे एक लम्बी लडाई लड़नी है, इसीलिए वह थोडा बहुत संयत होकर अपनी तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने के लिए 'लोकपाल'फौरी तौर पर  भुला-बिसरा कर दाल रोटी के जुगाड़ में जुट गया था.

पर उसे जल्द ही मौका मिल गया. ५ राज्यों के चुनाव हुए , और उसमें उसने अपनी ताकत दिखा दी. जनता को जागीर समझाने वाले लोग चारो खाने चित हो गए. इसमें दलित परिवार में जनम लेकर 'दलित की बेटी' से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की ' महारानी' बन बैठी मायावती से लेकर देश के भावी कर्णधार कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी तक शामिल हैं. मायावती ने सत्ता खोया तो राहुल गांधी ने भी उत्तर प्रदेश की गद्दी की मार्फ़त दिल्ली के तख्त तक की दूरी ही नहीं बढ़ाई,बल्कि रायबरेली, अमेठी तक की अपने पारिवारिक पारंपरिक सीटों पर से पकड़ खो दी.  ऐसा नहीं की उत्तर प्रदेश के लोग सपा के युवा नेता अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने के लिए वोट कर रहे थे, फिर भी सपा सत्ता में आई. गोवा में भाजपा, उत्तराखंड में गिरते-लुढ़कते ही सही कांग्रेस, और पंजाब में चार दशकों की हिस्ट्री पलट कर ८४ साल के प्रकाश सिंह बादल ने  लगातार दूसरी बार जीत हासिल की. मणिपुर अपवाद रहा.

लोगों ने इस चुनाव में वोट गैर जरूरी लोगों को हटाने, हराने और भगाने के लिए किया तो चुना सिर्फ उन्हें जिन्हें वह चुनना चाहते थे. कांग्रेस जब रायबरेली की १० में से ८ सीटें हार रही थी तब भी पूर्वी उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के ललितेशपति  त्रिपाठी और नदीम जावेद जैसे युवा जीत गए , तो महज इसीलिये की जनता अच्छों को अपना नेता बनते देखना चाहती थी.उसने डीपी यादव, मुख़्तार अंसारी, ब्रजेश सिंह, अतीक अहमद  जैसे बाहुबलियों को धुल चटा दिया,प्रियंका के दौरों की लाज नहीं रखी, और बहनजी को यूपी की राजनीति से बाहर राज्य सभा में भेज दिया. उत्तर प्रदेश के कथित खुशहाली भरी तरक्की के न जानें कितने लम्बे चौड़े विज्ञापन उन्होंने टीवी चैनलों को दिए थे. पर कुछ भी काम न आया...इस बीच अन्ना फिर दिल्ली आये. इस बार देश से भ्रष्टाचार भगाने की  लडाई में शहीद हुए लोगों की याद के बहाने उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल फूंका. मुम्बई से उलट दिल्ली में फिर लोगों का मजमा जुटा, और अन्ना ने २०१४ की चुनौती दे दी.  

कहने का आशय यह की लिखने के लिए कितना कुछ था...पर अपन तो...पर आज रहा नहीं गया. कारण, मामला देश, मीडिया, सेना, लोकतंत्र और सम्मान का था. सभी जानते हैं की अपने वर्तमान सेना प्रमुख  जनरल वी के सिंह अपने उम्र की सही तिथी की लडाई सालों से सरकारी तंत्र से लड़ रहें हैं. सेना ज्वाइन करने के दिनों में क्लर्क लेबल पर हुई गलतियों को वह सेना प्रमुख बनने के बाद भी  दूर नहीं करा सके. लोगों ने उनके सम्मान की इस लडाई को उनके कार्यकाल से जोड़ कर देखा. सेना प्रमुख रक्षा मंत्रालय से लेकर, रक्षा मंत्री, प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री , यहाँ तक की देश की सबसे बड़ी अदालत तक गए, पर कहीं से भी उन्हें राहत नहीं मिली. कहा गया की वही जन्मतिथि मानी जायेगी, जो गलती से ही सही, पहले दस्तावेजों में दर्ज है.   इस बीच उन्होंने सेना में चल रही घुसखोरी और भ्रष्टाचार का सवाल उठाया. सरकार ने तो उनकी बात ध्यान से सुनी, पर मीडिया के एक हिस्से ने प्रचारित किया जनरल सिंह अपनी उम्र के मसले पर अपनी बात न माने जाने पर बात को इस तरह उलझा रहे हैं.  जिसपर संसद भी सुलगी. मामले की जाँच सीबीआई को सौंप दी गयी, पर तभी इन्डियन एक्सप्रेस अखबार ने एक  फुलझड़ी सी खबर को विस्फोटक बताकर, बनाकर छाप दिया.

किसी दौर में देश के भले और लोकतंत्र की मजबूती के लिए करोडो -अरबों रूपये का नुकसान सहने वाले स्वाधीनता सेनानी रामनाथ गोयनका के इस अखबार के मौजूदा कर्णधारों ने सेना की एक छोटी सी टुकड़ी की रूटीन प्रैक्टिस वाली मूवमेंट को ' दिल्ली कूच' का रूप दे कर नमक मिर्च लगा कर छाप दिया. खबर से ऐसे लगा, जैसे सेना ने उन दिनों में , जब उसके प्रमुख जनरल वी के सिंह की उम्र का मसला फंसा था , तब बिना सरकार को सूचित किये दिल्ली पर घेरा डाला था... कायदे से सेना ऐसे मूवमेंट आजादी के बाद से ही और खास कर २००१ से निरंतर कर रही है. यह एक रूटीन प्रक्रिया थी,   ठीक उसी तरह जैसे सचिवालयों में फाइलें मूव करती हैं. पर खबर को छापा ऐसे गया, जैसे भारत,पाकिस्तान बन गया हो, जहाँ सेना ही असली शासक है, और वह अब बैरकों से बाहर निकलने को तैयार है.

प्रधानमंत्री,रक्षामंत्री, सेना प्रमुख, पूर्व सेना प्रमुखों और रक्षा विशेषज्ञों ने इस खबर की कड़ी आलोचना की है. पर यह  केवल आलोचना करके भुला दिया जाने वाला वाकिया नहीं है. जाहिर सी बात है, यह खबर न केवल देश के लोकतंत्र, हमारी व्यवस्था, संविधान बल्कि सेना की उस बलिदानी गरिमा के भी  खिलाफ थी , जिस पर हर भारतीय को गर्व है. अब  खबर यह आई है की सेना के बारे में ऐसी  खबर केंद्र सरकार के ही किसी मंत्री के इशारे पर छपी थी. वजह और व्यक्ति चाहे जो हो, हमारी महान लोकतान्त्रिक परंपरा से खिलवाड़ करने की  हरकतों को राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में रखा जाना चाहिए...भले ही इसके दायरे में कोई अपना ही क्यों न आ रहा हो, चाहे वह नेता, अफसर, संपादक या पत्रकार ही क्यों न हो.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

वोट दें

क्या विजातीय प्रेम विवाहों को लेकर टीवी पर तमाशा बनाना उचित है?

हां
नहीं
बताना मुश्किल
 
stack