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अन्ना, राजा, सुशील और सन्नी के साथ स्वागत 2012

अन्ना, राजा, सुशील और सन्नी के साथ स्वागत 2012 हर साल पहली जनवरी को नए साल के स्वागत से पहले दिसंबर की आख़िरी तारीखों के आते ही बीतने वाले साल की घटनाओं व उपलब्धियों के लेखेजोखे के साथ, नए साल की चुनौतियों पर चर्चा करना मीडिया की कितनी पुरातन परंपरा का हिस्सा है, यह तो नहीं पता, पर जब से होश सम्हाला है, तब से अब तक अख़बारों में यही देखता रहा हूँ. इस कदर की अब अखबारों के पन्नों को बिना पलटे ही 'दिसंबर' अपने आप घसीट कर बीतते साल की 'जनवरी' में पहुंचा देता है, जहाँ से चलते-चलते पूरा साल एक फिल्म की भांति आँखों के सामने गुजर जाता है.

आखिर साल के 365 दिनों की उम्र यादों में भला होती ही कितनी है, चाहे उस साल घटे पलों ने इतिहास रच डाला हो और उन पलों को बनने-बनाने में सालों लग गए हों. समय के साथ चलकर भी यादों में जीने की इसी इनसानी फितरत से ही तो इतिहास बनते हैं. संभव है, घटनाएँ, उपलब्धियां, बदलाव और उठापटक क्रमवार, तारीखबद्ध होकर याद न आयें, पर बड़े वाकिये अपने आप सजीव हो उठते हैं.

साल 2011 राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफी उथल-पुथल वाला साल रहा. लगभग हर दिन उठा पटक और सनसनी खेज घटनाओं से लबरेज. विज्ञान, तकनीक, अर्थ, वाणिज्य, प्रकृति, कूटनीति और सियासी हलकों के साथ जंग के मैदान जैसी उत्तेजना केवल सैन्य हलकों में ही नहीं आम जनों में भी इस साल जिस कदर देखी गई, अब से पहले कभी नहीं देखी गई.

सही मायनों में कहें तो बीता साल सरकारों का नहीं जनता का साल रहा है. खाड़ी देशों की राजधानी से शुरू कर , न्यूयार्क के वालस्ट्रीट होते हुए, दिल्ली के रामलीला मैदान से मुंबई के आजाद मैदान तक हर जगह जनता की हुंकार ने हुक्मरानों की नाक में नकेल भले ही न डालें हों, पर उन्हें जनमत की ताकत का अहसास जरूर करा दिया. इस बीच कई बड़े, अच्छे-बुरे हमारे बीच से गुजर गए, पर इन सबके बीच जो हमेशा-हमेशा के लिए याद रह जाने वाला था,या है, उनमें निश्चय ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ओसामा बिन लादेन का मारा जाना, मिस्र में हुस्नी मुबारक का तख्ता पलट और लीबिया में  कर्नल मुआम्मर गद्दाफी का तख्तापलट और अंततः उनकी हत्या, जापान की प्राकृतिक त्रासदी के बीच मानवीय तकनीक से उपजा संकट, और एप्पल के कर्ताधर्ता स्टीव जोब्स का जाना ऐसी घटनाएँ हैं,जिन्हें भूलना संभव नहीं. यही नहीं सदाबहार हीरो देवानंद, ख्यातिनाम गायक भूपेन हजारिका, गजल के बेताज बादशाह जगजीत सिंह और राग दरबारी के लेखक श्रीलाल शुक्ल का न होना हमेशा खलेगा.

इसी तरह भारत में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम पर सियासत कर सत्ता की मलाई चखने वाले सियासतबाजों को उन्हीं गांधी के बेहद विस्तृत सिद्धांतों के एक अदने से हिस्से, 'अहिंसा' और 'सत्याग्रह' का अनुसरण कर जनता की आवाज को धार देने वाले एक 73 साल के बूढ़े अन्ना हजारे की हुंकार को भुलाना भी संभव नहीं, जिन्होंनें उन नेताओं को सही जगह दिखाई जो संविधान की आड़ में संसद की सर्वोच्चता की दुहाई दे भ्रष्टाचार को पालने-पोसने में न केवल महारथ हासिल कर चुके थे बल्कि इस बात का मुगालता पाले बैठे थे की भ्रष्ट व्यवस्था, भ्रष्ट कर्मचारी के दम पर वे हमेशा ही जनता का गला घोंटते रहेंगे.  ऐसे नेताओं के लिए जनता  के हक़ से ज्यादा भ्रष्ट सरकारी मुलाजिमों के अधिकार ज्यादा महत्त्वपूर्ण थे. इसी लिए साल 2011 के आखिर में जब समूची दुनिया क्रिसमस और नए साल के आगमन के खुमार में डूबी है, तब हम इस बात की कयास लगाते दुबले हुए जा रहे की अन्ना हजारे के अनशन का प्रतिफल आम जन को मिलेगा या नहीं, क्या अन्ना की मांग पर बना - गढ़ा सरकारी लोकपाल भ्रष्टाचार को जड़ से मिटा सकेगा?

लोकसभा में पहले संसदीय मान्यता वाला कानून बनने से चुक जाने वाले  सरकारी लोकपाल विधेयक का राज्यसभा की बहस में वह हश्र हुआ की सरकार वोटिंग की हिम्मत ही नहीं जुटा सकी. अब बजट सत्र  का बहाना है, पर हमारे लोगों की यादों से महिला आरक्षण विधेयक का हश्र अभी मिटा नहीं है. संसदीय व्यवस्था में संसद और विधानसभाएँ सर्वोच्च हैं,  तभी तो  ममता बनर्जी अपने ठेठ अंदाज में जूझ कर पश्चिम बंगाल की गद्दी पर तीन दशकों से काबिज हंसिया और हथौड़े के चिन्हों वाले लाल झंडे का परचम उखाड़ फेंक तृणमूल को सत्ता दिला सकीं.

साल 2011 कानूनी सक्रियता के लिए भी खासा जाना जायेगा, जब भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते सत्ताधारी दल को न केवल अपने बल्कि अपने सहयोगी दलों  के बड़े  नेताओं को भी जेल की हवा खिलानी पडी.  ए  राजा, कनिमोझी और कलमाडी से लेकर कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं और वी एस येद्दयुरप्पा तक, सबने लाल हवेली का मजा लिया. कई बड़े व्यापारिक घरानों के हुक्मरान तो नपे ही सरकारी मुलाजिमों की भी धर पकड़ हुई. पर यह सब तब ज्यादा सुहाता जब यह  कानून के रसूख या सहज व्यवस्था की देन  होता.  पर इनको कठघरे में लाने में कितना कुछ पापड़ बेला गया, ढका छिपा नहीं है.

बिना परदे की हलचलों का जिक्र किये, बात अधूरी रहेगी. एक ओर समाचार चैनलों ने गंभीर आन्दोलनों को भी अपने रंग में रोचक बनाकर घर-घर में पहुंचा दिया, तो दूसरी तरफ 'दबंग,' 'बोडिगार्ड', 'डोन' और साल के जाते-जाते 'डर्टी पिक्चर' ने सफलता की नई इबारत लिखी. पर इन सबके बीच छोटे परदे पर बिग- बी  अमिताभ बच्चन के साथ 'कौन बनेगा करोडपति 5' के विजेता सुशील कुमार और 'बिग बॉस 5' के घर को रोशन कर रही पोर्न स्टार सन्नी लियोन की चमक का क्या कहना. सन्नी कनाडा से आई और छा  गईं तो सुशील उत्तर भारत के एक छोटे से गांव से आये थे.  
 
अपना देश मान्यताओं और भावनाओं पर चलने वाला देश है. हम चाहे चाँद पर पहुंचने की फ़िराक में हों, और हमने क्रिकेट को जूनून बनाकर उसका वर्ल्ड कप अपने देश में लाने में कामयाबी  पा ली हो,  और बड़े- मेट्रो शहरों की चमचमाती लाइटों में डीजे की डिस्को धुनों पर ' व्हाई दिस  कोलावारी डी ' पर इठला और इतरा रहे हों, भले ही हमने अपने यहाँ धरती पर सबसे तेज रफ़्तार से भागने वाले ड्राईवरों की फार्मूला वन रेस करा ली, पर हमारे यहाँ इस चकाचौंध के बावजूद अब भी मुस्लिम पिछड़ों को आरक्षण, मुल्ला पेरियार बांध का पानी , उत्तर प्रदेश का 4 हिस्सों में बंटवारा चुनाव जीतने -जिताने का बड़ा मसला बन सकता है. हमारे लिए नक्सलवाद, शायद नस्लवाद से बड़ा खतरा है. बावजूद इसके जम्मू- कश्मीर में चुनावी सियासत हमारी सेना के सालों की कुर्बानी पर भारी पड़ रही है. वहां सेना को मिले विशेष अधिकारों को हटाने की बात हो रही है, तो देश के बाजारों में ' वाल मार्ट' जैसे वैश्विक ब्रांड को घुसाने की कोशिश हो रही है. 

इतनी सारी विसंगतियों और सोच के बीच देश किधर जायेगा, और हमारा हमारे बच्चों का कल कैसा होगा, यकीनन कुछ कह पाना मुश्किल है. जाति, धर्म, परंपरा, और पुरातन मान्यताएं इस कदर हमारे लोगों के दिलोदिमाग में बैठी हैं की वह इहलोक ही नहीं परलोक तक की सोच में अपना कल ही नहीं आज भी बरबाद करने में लगा है, ऊपर से भ्रम ये की वह अपने समाज, परिवार, जाति, धर्म पर कुर्बान है. भ्रष्ट नेता और भ्रष्ट व्यवस्था हमारे लोगों की इसी सोच से पैदा होते हैं. आज दुनिया भर में जितने भी तरह के अनाचार और जोर जुल्म हैं, उन सबके पीछे हालातों से समझौता कर लेने की सोच और स्वीकार लेने की मान्यता का सबसे बड़ा हाथ है.   

साल 2011 दुनिया भर में भयानक उथल-पुथल और बदलाओं का साल रहा है, अभी तक के जो हालात हैं, उनमें 2012 भी पीछे रहने वाला नहीं है, पर 2012 दुनिया के लिए सकारात्मक बदलाव का साल हो और हमारी दिमागी गरीबी मिट सके, यही कामना. 

सुस्वागतम 2012 !
Jai Prakash Pandey
Jai Prakash Pandey 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पांडेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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