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बोल की लब आज़ाद हैं तेरे

जय प्रकाश पाण्डेय , Aug 14, 2011, 3:32 am IST
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बोल की लब आज़ाद हैं तेरे

किसी देश के जीवन में 65 सालों की उम्र कोई खास मायने नहीं रखती, पर उसका महत्त्व तब काफी बढ़ जाता है जब यह उम्र खुली हवा में, अपनी धरती, अपना आसमान,  अपने सपने, अपने अरमान और अपनी उम्मीदों के साथ हासिल की गई हो. जिसमें आजादी की खुमार ऐसी हो  की सफलता ही नहीं संघर्ष भी अपने लगें, तो मन इतराता ही है. आज 15 अगस्त है. हमारी आजादी का वह दिन जो आज ही नहीं 1947 के बाद से हर इस तारीख को यह याद दिलाता है, की भारत और भारत के लोग, अपनी तमाम विविधताओं, जटिलताओं और अंतर्विरोधों के बावजूद एक राष्ट्र के रूप में न केवल पल्लवित, पुष्पित और प्रतिष्ठित होने में सक्षम हैं,  बल्कि इस दिशा में दुनिया की रहनुमाई करने के योग्य भी हैं.

15 अगस्त 1947 के बाद से आज तक भारत ने एक देश के रूप में क्या कुछ हासिल किया और क्या कुछ झेला यह किसी से छिपा हुआ नहीं है. पर इन सबके बीच 1975 से 1977 के बीच के लगभग 28 महीनों के दौर को छोड़ दें तो देश का बड़े से बड़ा नेता सत्ता की तमाम ताकत, बेशुमार लोकप्रियता और अपने या अपनी पार्टी के पास मौजूद अकूत धनराशि के बावजूद देश का असली शासक होने का दावा नहीं कर सकता, क्योंकि हमारी संवैधानिक व्यवस्था में असली ताकत जनता के पास है, वही अपने ऊपर शासन करने के लिए संसद/ विधानसभा  में अपने नुमाइंदों  का चुनाव करती है, जो राज्य-व्यवस्था के संचालन के लिए, सांसद, विधायक बन कर अपने बीच से ही प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री का चुनाव करते हैं.  कोई अनहोनी न हो तो आदर्श के तौर पर यह व्यवस्था हर 5 साल में दोहराई जाती है, ताकि कोई एक दल या व्यक्ति, शासक चुनने के जनता को मिले' संवैधानिक'  अधिकारों का हनन नहीं कर सके.

देश की आजादी के बाद हमारे संविधान निर्माताओं ने अगर दुनिया भर में प्रचलित सभी शासन व्यवस्थाओं का अध्ययन कर हमारे लिए 'प्रजातंत्र ' चुना तो इसका एक ही मकसद था, देश के हर नागरिक का बराबरी का अधिकार और सम्मान. कर्तव्य भी इसके साथ ही जुडा था. पर समय के साथ जैसे-जैसे हमारा प्रजातंत्र बचपन से किशोर और किशोर से युवा होते हुए प्रौढ़ होता गया, हममें तरक्की के साथ -साथ खामियां भी आती गईं, जिन्होंने खामियों से बुराई और बुराई से बीमारी की शक्ल ले ली. इनका असर इतना तेज था की पहले इसमें नेता फंसे, फिर अफसर, बाद में व्यवसाई और सबसे आखिर में खुद जनता. इस बीमारी के कई रूप थे, जिनमें खास था - भ्रष्टाचार, रिश्वत, जातिवाद और भाई- भतीजावाद.  इन्होंने देश के हर हलके में ऐसी गहरी जड़ें जमाईं की बुनियादी जरूरत की बातें हवा हो गईं.  सड़क, शिक्षा, अस्पताल से लेकर रोटी, कपड़ा और मकान तक. आरक्षण और आबादी, तरक्की और बराबरी, सबको रोजगार और जीवन में सदाचार जैसे विषय केवल संसदीय बहसों और कोरमों का हिस्सा भर रह गए.

आलम यह हुआ की देश की ज्यादातर जनता या तो इस रेस में शरीक होकर इसका हिस्सा बन गई या फिर उसने चुप्पी साध ली. इसका सबसे पहला असर आम चुनाओं पर पड़ा. अच्छे लोग राजनीति को हिकारत की नजर से देखने लगे, तो मध्य वर्ग ने चुनावी बूथों से अपनी दूरी बना ली, नतीजा घटते वोट प्रतिशत के रूप में सामने आया. यह सबकुछ ऐसे ही चलता रहता अगर आजादी के बाद जवां हुई पीढ़ी ने दुनिया भर में बह रही उदारीकरण की हवा में सांस ले, तेजी से बदलते परिदृश्य में सांस ले, कंप्यूटर और इंटरनेट के जरिए अपने को बदल और यह जान न लिया होता की उसका हित कहां है. मजे की बात तो यह की यह पीढ़ी  अपने हित व तरक्की के लिए जितनी स्वकेंद्रित थी, अपने विचारों और जानकारी के मामले में उतना ही वैश्विक भी थी. अपने ज्ञान और श्रम से उसने पुरातन लोगों से काफी पहले ही यह जान लिया की समस्या की जड़ कहां है और उसका समाधान कहां. 

आज 15 अगस्त के पावन मौके पर इन बातों का जिक्र अनायास नहीं है. भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त लोकपाल की मांग को लेकर चर्चित गांधी समर्थक अन्ना हजारे सब कुछ यथावत रहा तो कल 16 अगस्त से आमरण अनशन पर बैठने वाले हैं. पिछली बार उनके समर्थन में समूचे देश का युवा वर्ग  खड़ा हो गया था. केवल नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर ही नहीं देश के हर छोटे-बड़े शहर में उनके समर्थन में रैलियां, धरना, प्रदर्शन, भूख -हड़ताल किये गए. जनमत का समर्थन अन्ना को कुछ यों मिला की देश का समूचा मीडिया भी साथ हो लिया. इंटरनेट पर सोशल नेटवर्किंग साइट्स अन्ना के समर्थन से अट गईं. नतीजा सरकार झुकी, उसने अन्ना से बातचीत की और उनके मनमुताबिक कारगर जन-लोकपाल लाने का वादा किया. आनन-फानन में इसके लिए एक बेहद पावरफुल 10 सदस्यीय कमेटी,  जिनमें प्रणब मुखर्जी जैसे नंबर 2 की हैसियत रखने वाले काबिना मंत्री सहित सरकार की तरफ से 5 केन्द्रीय मंत्री और  बाकी 5 में अन्ना सहित कानून जानने और उनमें भरोसा रखने वाले उनके 4 साथी शामिल थे, बना दी गई... और जब यह लगा की सब कुछ ठीक हो गया है, तब सरकार ने गच्चा दे दिया.

पहले से ही मौजूद सैकड़ों बेअसर कानूनों की तरह ही एक दंतहीन लोकपाल बिल संसद में पेश कर दिया गया. इस बीच अन्ना की इमेज बिगाड़ने की बहुतेरी कोशिश की गई. उनका कद छोटा करने के लिए उनके खिलाफ जांच कराने से लेकर, उनके लोगों में फूट डालने, उनके खिलाफ बाबा राम देव को खड़ा करने, फिर से बातचीत शुरू करने , यहां तक की उन्हें उकसाने के तमाम हथकंडे अपनाये गए. कहा तो यहां तक गया की अन्ना को संसदीय व्यवस्था में विश्वास नहीं. आजादी से पहले जन्में, फ़ौजी रह चुके 73 साल के एक गांधीवादी, जिसके पास अपना कहने के नाम पर चंद कपड़े, गांव के बाहर बना एक कमरा, ढेर सारी समाजसेवा और देश भर में हासिल बेशुमार जन समर्थन भर हो, की एक जायज शांतिपूर्ण मांग असंसदीय कैसे है, फैसला आप सबके हाथ... फिलहाल तो अन्ना के मिशन को शुभकामनाएं. 

...और अंत में कुछ निजी: आप सबके स्नेह से आज से ठीक एक साल पहले www.facenfacts.com  ने सूचना, जानकारी, ज्ञान और मनोरंजन के अंगरेजी के एक पोर्टल के रूप में जन्म लिया था. 15 अगस्त को जिस दिन हम आन लाइन हुए थे, शाम तक विश्व में अलेक्सा (वह साईट,जो विश्व की समस्त साइटों की विश्व और राष्ट्रीय रैंकिंग का ब्यौरा रखती है, और इंटरनेट जगत में सर्वाधिक स्थापित है)  पर हमारी रैंकिंग एक करोड़ थी, जबकि भारतीय इंटरनेट क्षितिज पर उस दिन हमारी पहचान केवल हमारी  ई - मेल और उन मोबाईल संदेशों की मार्फ़त भर थी, जिन्हें हमने आप सबके स्नेह और आशीष के लिए भेजा था.

आज महज साल भर के भीतर आप सबके प्यार, दुलार, सहयोग  और समर्थन से  फेस एन फैक्ट्स ने वह मुकाम हासिल कर लिया है, जो करोड़ों-अरबों रुपए लगाकर औद्योगिक रूप में स्थापित किए गए बड़े मीडिया समूहों के लिए भी सपना है. अलेक्सा पर आज हमारी यानी आपकी प्रिय साईट www.facenfacts.com  की रैंकिंग विश्व में 47,716 है. भारत में भी www.facenfacts.com की रैंकिंग 5785  है. यह रैंकिंग हर तरह की, हर वर्ग की साइटों के बीच है, जिनमें रेल- आरक्षण, बैंकिंग, होटल, टिकटिंग और न्यूज सहित हर तरह की साईट शामिल हैं. यह कम नहीं की रैंकिंग आंकने वाली तमाम साइटें अपने वर्ग में फेस एन फैक्ट्स की तुलना रायटर, स्टार न्यूज, जी-टीवी और हिंदुस्तान टाइम्स जैसे स्थापित पोर्टलों से करती हैं. इस बीच मार्च 2011की 28 तारीख से फेस एन फैक्ट्स हिन्दी में भी अपने पाठकों के बीच मौजूद है.    

एक साल की उम्र भला होती ही क्या है? सो आप सबके प्यार, दुलार से  मंजिलें अभी और भी हैं, सपने अभी बाकी हैं. आने वाले कल में आप सबका सहयोग यों ही हासिल होता रहेगा, इसी कामना के साथ. कोटिश: धन्यवाद.

स्वतंत्रता दिवस की कोटिश: शुभकामनाएं! जय हिंद!                     

जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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