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मीडिया का मुगालता और प्रधानमंत्री

मीडिया का मुगालता और प्रधानमंत्री यह बात ग़लत है कि मीडिया पर बेहद कम लिखा जाता है. लिखा जा रहा है और खूब लिखा जा रहा है. मेरे एक अनुजवत मित्र ,यह अधिकार उन्हीं यानी भाई यशवंत का दिया हुआ है, की एक साइट www.bhadas4media.com  इन्हीं लिक्खाड़ों के लिए चलती है. पर इतना कुछ लिखे जाने के बावजूद हमारा तबका अपने अंदर उस गहराई से झाँक नहीं पा रहा है, जिसकी ज़रूरत है. हमारी सारी बहस शहरी और गँवई पत्रकारिता, प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया, खोजी पत्रकारिता और पेड न्यूज, पत्रकारिता मिशन या व्यवसाय, कंटेंट और बाजार का दबाव, भाषा की शुद्धता या कामयाबी के फलसफे, अख़बार मालिक और पत्रकारों के शोषण, कौन कहाँ से हटा और कहाँ ज्वाइन किया, और बहुत हुआ तो एक -दूसरे की आलोचना या ज़्यादा से ज़्यादा वेज बोर्ड पर जा टिकती है.

हमारा कर्तव्य, आदर्श, जीवन दर्शन, अगर कुछ में बचा हो तो, सब दो वक्त की रोज़ी-रोटी कमाने और इस भ्रम को सच मान लेने में बीतता है की हममें सरकारे बदलने का माद्दा है, या हम जो चाहेंगे कर लेंगे, या देश का फलाँ मंत्री, फलाँ अफ़सर हमें जानता है, या हम संपादक हैं, लोग हमें पहचानते हैं, हमसे झुकते हैं, हमारा सम्मान करते हैं या फिर हमसे डरते हैं. सच कहूँ तो पढ़ने- लिखने से जुड़े हर एक में यह बुरी बीमारी शायद जन्मजात है. किसी लेखक, प्रोफ़ेसर, शिक्षक, डाक्टर को ले लो, अपने को विशेष मानने का मुग़ालता उसमें मिलेगा. अपने हुनर को पहचानना, उसका सम्मान करना और अपने आत्मसम्मान की रक्षा करने तक तो यह सब ठीक है, पर तब भय लगने लगता है, जब भ्रम अपने वजूद तो दूर अपने प्रोफेशन के कद से भी बाहर निकलने लगता है.

मीडिया जगत में इलेक्ट्रानिक मीडिया की पैठ के साथ यह बीमारी कुछ ज़्यादा ही गहराई से पनपी, क्योंकि वहाँ आप दूसरे वीआईपी के साथ खुद भी दिखते हो. पुराने समय में भी देश में ऐसे पत्रकार, लेखक थे जिन्हें प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति न केवल जानते थे, बल्कि उनके सम्मान में कुर्सियाँ छोड़ देते थे. पर उन्हें भ्रम में सचाई छोड़ कभी डूबते उतराते नहीं देखा गया. अपने को विशिष्ट मानने की बीमारी मीडिया घरानों के मालिकों की थी, जो अपनी बराबरी के व्यवसाइयों में अपने परिचय के दायरे और मीडिया के अपने व्यवसाय की हनक को बढ़ा-चढ़ा कर हाका करते थे. पर अब चूंकि मालिक या तो खुद संपादक हो गये या फिर उन्होंने ऐसे संपादकों को रख लिया जो उन्हीं की तरह अपने बुने खोल में ही लिपटे रहते हैं.

हमारे देश की मीडिया किस तरह से आत्मश्लाघा का शिकार है कि अब तो मीडिया के प्रोफेशन से बाहर के उन मित्रों से जो ईमानदार, हुनरमंद व समझदार हैं, से बात करने में शर्म आती है कि हम भी उसी जमात का हिस्सा हैं, जिसने भाटों की ज़िम्मेदारी खुद के कंधों पर उठा ली है. आख़िर हो क्या गया है इस जमात को? कर क्या रहे हैं ये? किस मुगालते में हैं? भ्रम को सच मान कर जीने के चक्कर में हमारी हालत कहीं प्रेमचंद की कहानी के उस कुत्ते की तरह तो नहीं हो गई है, जिसे बैलगाड़ी के नीचे दोनों पहियों के बीच में चलते-चलते यह भ्रम हो जाता था कि गाड़ी 'पहिए और बैल' नहीं वही चला रहा है.

अफ़सोस तो यह कि अगर यह बरताव आज के नौसिखुए पत्रकारों का होता, तब भी कोई बात थी. यह बीमारी उपर से नीचे तक है, संपादक से लेकर नौसिखुओं तक, भले ही कलम पकड़ने और एक पन्ना भी शुद्ध लिखने की तमीज़ ना हो, पर अपने को तुलसीदास और विष्णु राव मानने का भ्रम कायम... बात इतनी सी रहती, तब भी गनीमत थी. पर यहां तो मुगालते का आलम यह है कि....29 जून 2011 को प्रधानमंत्री ने अपनी सुविधा से देश के गिनती के 5 संपादकों को सरकार का और अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया था. यह संपादकों की पहली खेप थी. मतलब आने वाले समय में यह सिलसिला जारी रहना है/था. यह एक तरह से देश के प्रधानमंत्री का अपनी स्टाइल का मीडिया संपर्क है.

यह एक घोषित तथ्य है कि अपने हालिया प्रधानमंत्री को यह पद जनता के बीच उनकी शोहरत के चलते या बतौर सत्तारूढ़ दल का नेता होने के चलते नहीं मिला है. उन्हें यह पद कांग्रेस अध्यक्षा की तरफ से अमूमन उस समय तक के लिए संभालना है जब तक राहुल गांधी इस पद के लिए परिपक्व या स्वीकार्य नहीं हो जाते. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह संभवत: इस मायने में अपवाद हैं कि उन्हें लगातार 7 साल से प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद भी एक दिन के लिए भी अपनी स्थिति को लेकर कोई मुग़ालता नहीं हुआ. राम के वनवास के दौरान भरत के अयोध्या पर शासन करने के दौर के अलावा सत्ता में होकर, शासक होकर भी उसे लेकर ऐसे निस्पृह बरताव का कोई दूसरा उदाहरण कम से कम मुझे तो याद नहीं आता.  

अब जब आप एक ऐसे प्रधानमंत्री से मुखातिब हों जिसने सिर्फ़ अपनी मेधा और वफ़ादारी के बल पर एक गांव के प्राइमरी स्कूल से शुरुआत कर रिजर्व बैंक का गवर्नर, देश के वित्त मंत्री, और प्रधानमंत्री पद तक की जिम्मेदारी संभाली हो, तो उसे अपने ईष्ट, जिसने उसे देश के सबसे बड़े पद तक पहुंचाया के अलावा, भला किससे भय लगेगा, और वह भला किसी और के प्रति जवाबदेह क्यों होने लगे? क़ायदे से मनमोहन सिंह मीडिया को एक हद तक दायरे में रखते हैं, और उससे तभी मुखातिब होते हैं, जब खुद ज़रूरत समझते हों. इसमें  जिसे बुलाया गया, उसकी काबिलियत महज इतनी थी की वह उस लाउड स्पीकर की तरह इस्तेमाल हो सकता था, जिसे जिस वैल्यूम में वह बजाना चाहते थे, बजा सकें...और उन्होंने यही किया भी, और कामयाब भी रहे. सारे अख़बारों, वेब साइटों और चैनलों पर उनके इसी मुलाकात की खबरें थीं.  पर पता नहीं कैसे वहाँ गये कुछ को भ्रम हुआ कि, एक का बयान था- प्रधानमंत्री आत्मविश्वास से भरपूर दिखे.

अरे भाई! आप कौन से सूरमा हो, जो प्रधानमंत्री का आत्मविश्वास आपसे डगमगा जाएगा? आप ना तो कांग्रेस अध्यक्ष, ना ही वह तुर्रमख़ान, जिनके नाराज़ या खुश होने से प्रधानमंत्री का कुछ बनना बिगड़ना हो, इन्हें तो चुनाव लड़ कर जनता के समक्ष भी नहीं जाना. खुद बेईमान हैं नहीं, कि पैसों का लालच हो, बेटी-दामाद जहां हैं, अपनी काबिलियत से हैं, उन्हें इन्होंने सीख ऐसी दी की इनके नाम के सहारे की ज़रूरत नहीं... जाहिर है जनाब, प्रधानमंत्री को पहचानने में भूल कर गये. खैर अब मिल आए हैं तो इतराने की जगह ज़्यादा ना सही, उनसे सादगी, ईमानदारी और बड़े पद पर रह कर सरलता का गुन तो कम से कम सीख ही लीजिए. क्या पता आने वाले कल में कुछ काम आ जाए.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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