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अबकी खतरा बड़ा है

अबकी खतरा बड़ा है देश एक अजीब से दौर में खड़ा है. एक तरह से कहें तो आज़ादी के बाद के सबसे कठिन दौर से. एक तरफ भ्रष्टाचार अपने चरम पर है तो दूसरी तरफ ग़रीबी. एक तरफ देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर देश का टैक्स बचाकर तस्करी कर लाई गई करोड़- 2 करोड़ की गाड़ियाँ पकड़े जाने के डर से यों ही लावारिस छोड़ दी जा रही हैं, तो दूसरी तरफ 60- 65 करोड़ जनता 20 रुपये दिहाड़ी के लिए मरने-मारने पर आमादा है. आप कह सकते हैं कि अमीरी और ग़रीबी हर देश में, हर काल में, हर युग में रहे हैं, पर इतिहास गवाह है कि अराजकता के हर चरम की परिणीति परिवर्तन है.

जब देश में माहौल ऐसा हो तो जागरूक लोगों, जननेताओं, समाज सेवकों, धार्मिक अगुवाओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे आगे बढ़ कर जनता को राह दिखाएंगे, उनकी समस्याओं को समझेंगे और उनकी मुश्किलों को हल करेंगे. सच कहें तो देश के आजादी की लड़ाई भी इसी तर्ज पर, इसी अंदाज में लड़ी गई और इसीलिए अंगरेज़ों की तमाम कूटनीति के बावजूद सैकड़ों रियासतों वाला भारत केवल 2 टुकड़ों में बट कर ' लोकतांत्रिक, संप्रभु, आज़ाद, समाजवादी गणराज्य- भारत और प्रभुता संपन्न इस्लामिक राष्ट्र-पाकिस्तान ( 1971 के बाद का बांग्लादेश भी) के रूप में जिंदा है.

भारत, भारतीय गणराज्य और भारतीय जन की संप्रभु सत्ता 'संसद' में केवल इसलिए निहित है कि वह समूचे देश के हर एक नागरिक का प्रतिनिधित्व करती है. मतलब साफ है, जो संसद में चुन कर आए, वे महज प्रतिनिधि हैं, स्वामी नहीं. उनका काम जनहित में, जनहित के काम करना है, और उसकी सही व्यवस्था के लिए शासन और सरकार चलाना है, ना कि पुराने रजवाड़े और अंगरेज शासकों के अंदाज में आम जन को गुलाम समझना. देश के संविधान की पहली लाइन ही- हम भारत के लोग.....से शुरू होती है. और संविधान देश के हर नागरिक के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है, यहां तक की कोई नेता, सरकार तो दूर, खुद संसद भी चाहे तो इन अधिकारों का पूरी तरह हनन नहीं कर सकती.

मेरी समझ से यह तथ्य देश की सत्ता पर काबिज या संसद में पहुंचे ज़्यादातर लोग भूल गये हैं. ' प्रभुता पाई काहे मद नाहीं ' के अंदाज में देश को लूट खसोट कर नये रजवाड़ों, और राजाओं की शक्ल में उभर आए इन नव धनाड्य नेताओं को शायद जनता के भोलेपन और अपनी ज़बानी जुगाली पर कुछ ज़्यादा ही भरम हो आया है. इसीलिए इन्हें रोज ब रोज रोज़ी-रोटी के जुगाड़ में जूझती, भ्रष्टाचार और रिश्वत की दोहरी मार से पीसती जनता का दुख-दर्द नजर नहीं आता, केवल अपने अधिकार और अपनी झोली नज़र आ रही है.

आलम यह है कि देश की सियासत एक कारपोरेट कंपनी की शक्ल अख्तियार कर चुकी है और सत्ता के इस हमाम में सब नंगे हो चुके हैं. माफ़ करिएगा- इस मामले में, कांग्रेस, भाजपा, माकपा, बसपा, सपा और वे सभी दल, जो आज शासन कर रहे हैं या विपक्ष में हैं, में कोई अंतर नहीं. जनता के लिए तमिलनाडु की अम्मा जयललिता के सैकड़ों सैंडिल और ए राजा के भव्य घर, या फिर उत्तर प्रदेश की मायावती के 6 मिनट वाले टीवी एड पर टिके अराजक उत्तर प्रदेश और भाजपा के शाइनिंग इंडिया के दौर वाले देश, या फिर पश्चिम बंगाल के सिंगूर - नंदीग्राम वाली माकपा या फिर पास्को के लिए गोविंदपुर की ज़मीन ले रही नवीन पटनायक की सरकार या महाराष्ट्र के कांग्रेस शासन वाले ज़ैटापुर में क्या अंतर है? प्रकाश सिंह बादल, ओम प्रकाश चौटाला, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद, वी एस येदुरप्पा, चंद्रबाबू नायडू, यहां तक की आंध्रा के रेड्डी... गिनती इतनी लंबी है कि कई किताबें कम हो जाएं, तो क्या इन सभी लोगों पर बात केवल इसलिए नहीं की जा सकती कि ये लोग चुनावों में लड़ कर जीत कर आए थे, आए हैं और शासन कर रहे हैं.

लोकतांत्रिक व्यवस्था में बहुमत के शासन का अर्थ अल्पमत की अनदेखी नहीं है. लोक का मतलब ही है हर एक नागरिक. और लोकतंत्र का मतलब है- हर एक नागरिक के लिए सुनिश्चित बराबर और बराबरी की व्यवस्था. इस व्यवस्था में टाटा, अंबानी, सोनिया गांधी, प्रणब मुखर्जी ही नहीं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के वोटों की भी उतनी ही कीमत है, जितनी घुरहू और चमेली की. यानी लोकतांत्रिक व्यवस्था बहुमत के शासन के बावजूद यह सुनिश्चित करती है कि हर कोई बराबर है, इसलिए हर किसी की बात का उतना ही महत्व है, जितना किसी एक का. संसद और सांसदों के विशेषाधिकार, सरकार और सरकार के प्रशासनिक अधिकार- संसदीय लोकतंत्र में व्यवस्था के संचालन के लिए हैं ना कि किसी एक, दो, पचास सांसदों या बहुमत के बल पर आम लोगों की अभिव्यक्ति को दबाने के लिए.

यहां ये बातें लिखने की जरूरत इसलिए आई कि देश की सत्ता पर काबिज लोगों ने पहले जनमत के दबाव में अन्ना हज़ारे के आंदोलन से घबडा कर ' लोकपाल' के लिए हामी भरी, और बाद में समूचे आंदोलन को आरएसएस के इशारे पर करार देते हुए यह जतलाना शुरू कर दिया कि जनता, जनमत, सिविल सोसाइटी केवल इसलिए दबाव नहीं बना सकती , क्योंकि उसे जनता ने नहीं चुना. सत्ताशीन लोग माफ़ करें, क्या वे इस विषय पर जनमत - संग्रह करने का माद्दा रखते हैं? क्या उन्हें वाकई यह नहीं पता कि एक तरफ आम जन त्राहि- त्राहि कर रहा है तो दूसरी तरफ सांसद बनना सेवा का नहीं करोड़पति, अरबपति बनने की गारंटी बन गया है.

इतिहास गवाह है कि राज्य सत्ता तभी तक टिकती है, जब तक जनता का भरोसा उस पर है. बड़े से बड़ा तानाशाह भी आधुनिक दौर में अपना शासन सुनिश्चित करने के लिए चुनाव का सहारा लेता है. हिटलर से लेकर, परवेज़ मुशर्रफ तक और पड़ोस के म्यांमार तक यही हो रहा है. तो क्या हम यह मान लें की हमारे वर्तमान शासक उसी दिशा की तरफ बढ़ रहे हैं? मतलब खतरा केवल बाहर से ही नहीं अपने अंदर से भी है. और किसी भी समाज की टूटन में ऐसे कारकों का बड़ा हाथ होता है. यह  खतरा उस समूची लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी है, जिस पर अब तक हम गर्व करते आ रहे थे.

देश के सबसे वरिष्ठ मंत्री प्रणब मुखर्जी और कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी के तर्कों से एक अलग तरह की धमकी का सा आभास मिल रहा है. प्रणब ने अभी कहा था- " हालात पूरी तरह 1970 जैसे नहीं हैं, लेकिन कुछ समानताएं हैं। 1971 और 1972 में विपक्षी मोर्चा कांग्रेस की भारी जीत से परेशान था। उसके अलावा एक वैश्विक संकट और सूखा था। कुछ लोगों ने एक आंदोलन को हवा देने की कोशिश की... लेकिन मैं आपको आश्वस्त करता हूं कि देश में आपातकाल दोहराया नहीं जाएगा।"  इसी तरह से कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा- 'सिविल सोसाइटी बिना चुने हुए ही, चुने गये लोगों के अधिकारों को हाइजैक करना चाहती है. हम ऐसा नहीं होने देंगे.'

देश पर शासन कर रही कांग्रेस आने वाले कल में क्या करना चाहती है, यह इन बयानों से जाहिर है. जिसका जवाब अन्ना के शब्दों में केवल इतना ही हो सकता है की- देश आज़ादी की दूसरी लड़ाई के लिए तैयार रहे.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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