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इसलिए कि वह अमेरिका है

इसलिए कि वह अमेरिका है काफी छोटा था जब तुलसीदास की यह चौपाई ' समरथ को नहीं दोष गुसाईं ' पढ़ी थी, पर अर्थ न तब समझ में आया था, ना ही अब आता है. मैं शाब्दिक अर्थ की बात नहीं कर रहा. बात हकीकत की है. कौन कमजोर है और कौन सामर्थ्यवान, इसको लेकर आज भी मेरे विचार गड्डमड्ड हैं, वह भी इस कदर की मानवता के अलावा हर चीज़ पर अनास्थावान होते हुए भी कभी-कभी 'मूंदहू आंख कतहूं कुछ नाही' के अंदाज में सब कुछ भूलने को जी करता है. पर काश ऐसा हो पाता.

आख़िर हम किस दुनिया और किस समाज में रह रहे हैं? आखिर हमारी आज़ादी, समझ, सभ्यता और सामर्थ्य का पैमाना क्या है? कौन तय करता है इसे? कोई इनसान? कोई पूंजीपति? कोई नेता? कोई राज्य? कोई राज्यसत्ता? या फिर समय? अपने देश में बहुतेरे उद्धरण हैं. रोज राह चलते हज़ारों मिल-दिख जाते हैं, नीचे से उपर के लेवल तक, पर सबसे सवालों की उलझन और बढ़ जाती है, बजाय घटने के. एक थे चंद्रास्वामी- नाम याद है कि भूल गये? इस नाचीज़ ने अपनी आंखों से डेढ़ दर्जन कैबिनेट मंत्रियों- मुख्यमंत्रियों को एक साथ लाइन में लग कर स्वामी के चरणों में झुकते देखा है.

अब केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों का ताम-झाम और ताकत तो छिपी नहीं आप सबसे, फिर चंद्रास्वामी कहां हैं आजकल? किस हाल में? वे मंत्री, वह ताक़त, वह सामर्थ्य कहां चली गई? आप कहेंगे, छोड़िए काफ़ी पुरानी बात है. मान लिया, छोड़ भी दिया. पर अटल जी, अरे अपने जननेता अटल बिहारी वाजपेयी जी की बात कर रहा हूं. कहां  हैं वाजपेयी जी आज-कल ? भारत के प्रधानमंत्री थे, एक-दो नहीं, तीन-तीन बार. अपने दम पर, अपनी इमेज के दम पर मिलीजुली सरकारों का प्रयोग सफल कर दिखाया था. सोनिया गांधी के दम पर कांग्रेस अगर जीती नहीं होती, तो शाइनिंग इंडिया के दम पर अटल जी ही फिर प्रधानमंत्री बनते. आप कहोगे उमर हो गई, इसलिए अटल जी....

इसका मतलब? सामर्थ्य क्या उम्र की मुहताज है?  एक बार इसे मान कर देखते हैं! पूर्व केंद्रीय संचार मंत्री ए. राजा और तमिल राजनीति के धुरंधर एम करुणानिधि की बेटी कनिमोझी की उम्र क्या है? इनके पास ताकत थी कि नहीं? है कि नहीं? फिर इन्हें तिहाड़ की हवा क्यों खानी पड़ी? आप कहोगे 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, इन्होंने करोड़ो खाए. चलो मान लिया, बिना फैसला आए दोषी हैं ये. पर लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान, मायावती, मुलायम सिंह यादव, जे. जयललिता, ओम प्रकाश चौटाला, प्रकाश सिंह बादल... या यही क्यों..95 फीसदी से अधिक मंत्री, सांसद और विधायकों के बारे में आपका क्या ख़याल है, जो 'जन सेवा' की फैक्ट्री से सिर्फ़ 'जन नेता' बन निकले, पर इन सबकी माली हैसियत कहां से कहां पहुंच गई... मुझसे नहीं, खुद से ही आंखे फाड़ कर अपने ही विधायक- सांसद को देख लीजिएगा, जवाब मिल जाएगा! हां, तो सवाल फिर वही है कि अगर सभी एक से हैं, सभी समान रूप से ताकतवर और पैसे वाले, तो कोई- कोई जेल में और ज़्यादातर बाहर क्यों हैं?

बेचारे कलमाडी, सुरेश कलमाडी. कामन वेल्थ गेम्स के दौरान क्या तूती बोलती थी? क्या जलवा था? किस कार में चलते थे? आलम यह था कि पूरी दिल्ली इन गेमों के नाम पर पहले सज़ा दी गई और फिर जेल बना दी गई. बेचारी जनता तो दूर मंत्रियों तक का सड़क पर चलना, निकलना कलमाडी जी के बिल्लों का मुहताज हो गया. आलम यह था की कामन वेल्थ गेम्स के खिलाड़ियों के लिए बनी सड़क से प्रधानमंत्री के काफिले को गुजरने की अनुमति को एहसान सा जता कर मीडिया में परोसा गया.. वही कलमाडी आज जेल में हैं..और उनके साथ बमुश्किल दर्जन, दो-चार दर्जन लोग आरोपी. क्या केवल इतनों ने ही किया घोटाला? अगर नहीं तो बाकी बाहर और ये अंदर क्यों?

आप कह सकते हो, राज्य व्यवस्था ने इनका साथ छोड़ दिया, इसलिए ये अंदर. तो इस बार इस बात को मान कर देखते हैं. 'राज्य व्यवस्था' कौन सी 'राज्य व्यवस्था' ? आप कहेंगे किसी भी संप्रभु राज्य की राज्य व्यवस्था! ठीक. पर संप्रभु कौन है? अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की सेनाओं ने बिना पाकिस्तान को पूछे उसकी धरती, उसकी राजधानी के नज़दीक फ़ौजें भेज कर हमला किया और अपने दुश्मन ओसामा बिन लादेन को मार गिराया.

बिना मुकदमा चलाए, बिना अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की परवाह किए. ओसामा जब मारा गया , तो वह निहत्था था. फिर भी सामाजिक न्याय, इनसानी सभ्यता और अपना पक्ष रखने के उसके मानवीय अधिकारों की अनदेखी की गई. किसने की अनदेखी? जो अपने को सबसे सभ्य नागरिक समाज का हिस्सा और लोक तंत्र का पहरूआ बताते हैं. अमेरिका ने ओसामा को मारा क्योंकि अमेरिका के मुताबिक ओसामा के निर्देश पर अल-क़ायदा नामक आतंकवादी संगठन के आतंकियों ने अमेरिका की सबसे उँची बिल्डिंगों ' ट्वीन टॉवर' पर जहाज़ से हमला कर उसे ज़मींदोज कर दिया था, जिसमें हज़ारों निर्दोष मारे गये थे.

मान लेते हैं अमेरिका ने शत प्रतिशत सच कहा, पर ओसामा और उसके लोगों ने अमेरिका पर हमला क्यों किया? आख़िर उनकी अमेरिका से क्या नाराज़गी थी? क्या यह जानने का हक दुनिया को नही है? पर अमेरिका ने ओसामा को यह बताने का मौका नहीं दिया. क्योंकि इस मामले में अमेरिका ही वादी, प्रतिवादी और जज तीनों था. फिर ओसामा और अमेरिका की लड़ाई में पाकिस्तान की, बतौर 'संप्रभु राष्ट्र'  पाकिस्तान की आज़ादी कहां गई? अमेरिका ने, अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने इसी रविवार यानी 22 मई को बीबीसी पर प्रसारित एक इंटरव्यू में कहा है कि दुनिया को ऐसे और भी अमेरिकी हमलों के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि अमेरिका की रक्षा करने के लिए, हम अपने लिए खतरा बन चुके लक्ष्यों को ख़त्म करने के लिए, किसी भी हद तक जा सकते हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के इस लहजे का मतलब क्या है?  अगर सच कहें तो फिर कोई राष्ट्र सुरक्षित नहीं. शायद केवल चीन, कुछ हद तक रूस भी, क्योंकि इनकी तकनीक और परमाणु ताक़त इतनी है कि अगर ये भिड़े, तो अमेरिका खुद भी ना बचेगा... पर बाकी राष्ट्र, राज्य व्यवस्था और उनकी ताक़त और संप्रभुता का क्या हुआ? वह अपनी आज़ादी और वजूद के लिए अमेरिकी इशारों के मुंहंताज है. अमेरिका ने रासायनिक हथियारों के नाम पर इराक़ को नेस्तनाबूद कर दिया, वहाँ के ताकतवर शासक सद्दाम हुसैन , जब अमेरिका के कथित हमले में मारे गये, तो वह गड्ढे में छिपे थे. तालिबान के ख़ात्मे के नाम पर अफ़ग़ानिस्तान, यहां तक की पाकिस्तान में रोज हमले हो रहे हैं. समूचा मध्य एशिया, मिस्र, लीबिया, बहरीन या तो विद्रोह या नाटो के बमों के हमले का शिकार है. क्या वाकई नाटो की अगुवाई में अमेरिकी सेनाओं द्वारा गिराए गये बम निर्दोष नागरिकों, बच्चों, बूढ़ों, महिलाओं को नहीं मारते? और अगर ये मरते हैं, तो...

फिर वही बात...आज के दौर में ताक़त, सामर्थ्य अमेरिका के अलावा किसी के पास नहीं. वह किसी को, कभी भी, कुछ भी बना सकता है. केवल असभ्यों, आतंकवादियों , संप्रभु राष्ट्रों और तीसरी दुनिया के नेताओं को ही नहीं, अब तो उसके निशाने पर विकसित देशों के अपने मित्र नेताओं के राजनीतिक विरोधी भी आ गये से लगते हैं. आईएमएफ यानी अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के ताकतवर अध्यक्ष और फ्रांस में अगले राष्ट्रपति चुनावों में राष्ट्रपति पद के सशक्त उम्मीदवार डोमिनिक स्ट्रॉस कान को न्यूयार्क में एक होटल परिचारिका के साथ बलात्कार की कोशिश करने के आरोप में हवाई जहाज़ के भीतर से उसके उड़ान भरने से ठीक 2 मिनट पहले उतार लिया गया. मीडिया में ऐसा माहौल बनाया गया, जैसे 62 साल के कान से बड़ा चरित्रहीन और कोई नहीं.

अमेरिकी परिचारिका सतीसावित्री सीता और कान रावण. बेचारे कान को तब तक जमानत नहीं मिली जब तक उन्होंने आईएमएफ़ का अध्यक्ष पद छोड़ नहीं दिया. फिलहाल उन्हें जमानत मिल गई है, पर किन शर्तों पर? जेल से रिहा किए जाने के बाद लोवर मैनहट्टन के एक अपार्टमेंट में उन्हें रखा गया है, जहां एक निजी सुरक्षा गार्ड 24 घंटे उन पर निगरानी रखेगा. स्ट्रॉस कान को शहर के 71 ब्रॉडवे अपार्टमेंट में सुरक्षा गार्डो के लिए 200,000 डॉलर प्रति महीने का भुगतान करना होगा. 10 लाख डॉलर नकद जमानत राशि और 50 लाख डॉलर का बांड वह जमानत के लिए पहले ही दे चुके हैं. इतने के बावजूद भी अमेरिकी जज ने उन्हें पैर में एक रेडियो कॉलर पहनने के भी आदेश दिए हैं. जैसे ही वह बाहर कदम रखेंगे, रेडियो कॉलर का अलार्म बजने लगेगा. अब जब कान मुक़दमें से छूट कर फ्रांस पहुंचेंगे, तब तो अमेरिका के मित्र निकोलस सारकोज़ी को चुनौती देंगे... वह भी तब, जब उन्हें निर्दोष करार दिया जाए.

तो...हमारे भारतीय समाज के आज के सभ्य, सामर्थ्यवानों, ताकतवरों, सावधान हो जाओ, संभल जाओ, ज़रा सोचो, और बताओ कि सभ्य, आज़ाद और सामर्थ्यवान कौन है? मेरे सवालों का उत्तर, मुझे तो नहीं मिला. अगर आपको मिले, तो इंतजार है...
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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