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....जय हो जनता जनार्दन की

....जय हो जनता जनार्दन की 'ये जो पब्लिक है, ये सब जानती है, ये जो पब्लिक है...' संभवत: 70 के दशक में लोगों की जबान पर चढ़ चुके इस गाने की आगे की लाइनें हैं- 'हीरे-मोती तुमने छिपाए, कुछ हम लोग न बोले, पर आटा-चावल भी छिपा तो भूखों ने मुंह खोले....'  5 राज्यों के विधान सभा चुनावों के नतीजों से गुजरते हुए बरबस इस गाने के बोल याद आ गये. इन पांचों राज्यों में जनता एक बार फिर जनार्दन बन कर उभरी है, और उसने सारी गणित, सत्ता की ताक़त, सिक्कों की खनक, रुपयों की चमक, वादों, नारों और समीक्षाओं को झुठला दिया है.

लगभग सभी राज्यों में सरकार चाहे जिस भी दल ने बनाई हो, जनता से मिले जनादेश का संदेश एक ही था-  हमारी अनदेखी अब संभव नहीं. भले ही  इन नतीजों के बाद अब राजनीति के जानकार चाहे जो दंभ भरें, और लाल बुझक्कड़ के अंदाज में कयास लगाने वाली सर्वे कंपनियां अपनी पीठ थपथपाएं, पर सच यही है कि पश्चिम बंगाल को छोड़ कर कहीं भी, कोई भी जनता के मन की सटीक थाह नहीं लगा पाया. हालांकि वहाँ भी 34 साल से शासन कर रहे वाम दलों को मुगालता कम नहीं था. सही मायनों में सर्वे और मीडिया तो दूर खुद नेताओं को भी ऐसे नतीजों की उम्मीद नहीं थी. दावे से तो पश्चिम बंगाल के बारे में भी नहीं कहा जा सका था.

मतलब साफ है, लोकतंत्र में 'नौकरों' यानी नेताओं को, जिन्हें हमारे संविधान निर्माताओं ने वाकई 'जनसेवक' 'जन- प्रतिनिधि' कहा था, को 'मालिक' यानी सत्ता संभालने के बाद सरकारी ताम-झाम में फंस शासक बनने का भ्रम नहीं पालना चाहिए, जनता का पेट भरे ना भरे, खुद का पेट नहीं भरना चाहिए... अगर सियासत से जुड़े लोग वक्त रहते, जनता के इशारों को समझ पाते, और दूसरों के हाल से कुछ सबक ले पाते , सही हालात समझ पाते, तो न तो वे खुद 'कभी अर्स पर, तो कभी फर्स पर' होते, न ही खुद उनकी, इस देश की, हमारे राज्यों व जनता की सियासी, माली और सामाजिक तस्वीर ऐसी होती. क़ायदे से चारो तरफ लूट-पाट के इस दौर में सियासत तो एक-दूसरे का गिरना- उठना देखकर ही सीखनी होगी.

विधान- सभा चुनावों के इन नतीजों पर बात करने से पहले थोड़ा पीछे चलते हैं. शुरुआत कांग्रेस से करते हैं. देश भर पर शासन कर रही यह पार्टी क़ायदे से अपने अकेले के दम पर किस बड़े राज्य में है? राजस्थान, हरियाणा, असम, दिल्ली, मिज़ोरम, मेघालय, अरुणाचल, गोआ की गिनती कहां बैठती है, आप खुद फ़ैसला कर लें. शेष 4 राज्यों में यह साथियों के भरोसे हैं. एक राज्य और है, आंध्र प्रदेश- जहां इनकी अकेले की सरकार है, पर कब तक, इन्हीं 5 राज्यों के साथ हुए उप चुनावों के नतीजे इशारा कर दे रहे. कांग्रेस की यह गत क्यों हुई? क्योंकि चमचागिरी, भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और सत्ता के मद ने जनता से कांग्रेसियों को दूर कर दिया. पार्टी पहले कई राज्यों में गई और फिर केंद्र में भी चली गई. अभी वह भले ही केंद्र की गद्दी पर काबिज है, पर उसकी जड़ें कहां हैं, यह हर कांग्रेसी को पता है, बशर्ते वह सत्ता की मलाई न चाट रहा हो. जहां तक राज्यों की बात है, आज जहां भी वह सहयोगियों के साथ सत्ता में है, ये सब उसी के तो पुराने लोग हैं.

ये बातें शायद पुरानी हैं, याद कीजिए बिहार में लालू प्रसाद यादव का उभार और पतन, चंद्र बाबू नायडू का उभार और पतन, इन्हीं करुणानिधी का उभार और पतन. लालू प्रसाद यादव को यह भ्रम था कि शायद पहली बार नीतीश तुक्के में जीत गये, इस बार बाजी इनके हाथ होगी. पर नतीजा- सबके सामने था. केंद्र में भी एन. डी. ए जब सत्ता से बाहर हुआ , तो उसे कांग्रेस ने नहीं, सोनिया गांधी के सड़क पर होने और भाजपाइयों के हवा में होने ने हराया, और जब कांग्रेस दोबारा जीत कर आई तो सोनिया का करिश्मा नहीं, प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह की सादगी ने साथ दिया था. भले ही वह अपने लिए चुनाव लड़कर अकेले के दम पर सीट ना जीत सकें, पर उनकी ईमानदारी का एक महत्व था, जिसने भाजपा के लौह पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी के प्रधानमंत्री बनने के सपनों को पिघला दिया.

कल के बेताज बादशाह मुलायम सिंह आज सड़क पर हैं, कभी की ताकतवर भाजपा का उत्तर प्रदेश में कहीं अता-पता भी नहीं. 34 सालों का लाल परचम जनता के वोटों की ताकत से उठी ममता की आँधी में इतनी दूर जा उड़ा है कि वाम मोरचा को सम्हलने में वक्त लगेगा. तमिलनाडु के करुणानिधि शायद संन्यास ही ले लें. यूपी में घुसने की कोशिश में कांग्रेस वहाँ तो अपने युवराज के चलते सड़क पर है, पर भ्रष्टाचार, बड़ी गाड़ियां और एयर कंडीशन का मोह पार्टी को लोक सभा चुनावों में कहां ले जाएगा, कह नहीं सकते.

दिल्ली में शीला दीक्षित केवल मेट्रो, सड़क और बिजली के चलते जीत गईं, वरना कामन वेल्थ के खुलासे अगर तब हो जाते, तो रिजल्ट कुछ और होता. आज असम में तरुण गोगोई जीते तो इसी लिए की ईमानदारी उनकी थाती है, उड़ीसा में नवीन पटनायक का परचम भी इसी लिए कायम है. बंगाल में वामपंथ जब जीता था तो जनता के चलते, और अब जब ममता जीतीं और वह हारा, तो उसी के चलते. इन फ़ैसलों में छिपी अगली चेतावनी केंद्र पर शासन कर रही कांग्रेस, यूपी पर राज कर रही माया और पंजाब में शासन कर रहे प्रकाश सिंह बादल जैसों के लिए है. अभी भी वक्त है, इन इशारों को समझो, वरना इसका भी वक्त नहीं मिलेगा!

हां, एक बात और.... इन सब बातों के बीच चुनाव आयोग की तारीफ करनी होगी, जिसने भारतीय लोक तंत्र की गरिमा को कायम रखने, संविधान निर्माताओं की उम्मीदों पर खरा उतरने और जनता को उसके मतों के अधिकार का अहसास कराने में महती भूमिका अदा की. साधुवाद.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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