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इमारतें क्यों जुड़ गईं अस्तित्व के पहचान से?

इमारतें क्यों जुड़ गईं अस्तित्व के पहचान से? अयोध्या के राम जन्म भूमि - बाबरी मस्जिद ढाँचे और अमेरिका के ट्विन टॉवर में क्या एकरूपता है? कितना अजीब और बचकाना सा सवाल है यह, जो वाकई किसी बच्चे ने पूछा था मुझसे. पर इसका जवाब उतना ही कठिन. ये दोनों ढाँचे, जो अपने मूल रूप में वजूद में नहीं हैं, ने इतिहास ही नहीं हमारे वर्तमान की भी दिशा बदल दी.

पहला, दो धर्मों की पहचान से जुड़ कर, सम-धर्म,सम-भाव की सोच वाले एक देश के पूरे धर्मनिरपेक्ष ढाँचे पर भारी पड़ा, तो दूसरा दुनिया के सर्वाधिक विकसित और ताकतवर देश की आर्थिक पहचान बन, जब आतंकी हमले में ढहा, तो दुनिया के दो बेहद आधुनिक समझे जाने वाले मजहबों के बीच इतनी गहरी खाईं पैदा कर गया, जिसके घाव वक्त भी धो पाएगा, दावे से कहना मुश्किल है.

आखिर इन ढाँचों में था क्या, जो हमारी अब तक की सीखी- सिखाई मानवीय सभ्यता, मानवीय गुणों, मानवीय विचार और मानवता पर भारी पड़ा. इतना की सदियों से साथ-साथ रहने वाले हिंदू- मुस्लिम अलग हो गये, कि ईसाइयों और मुस्लिमों के बीच नफ़रत ना सही अविश्वास की एक ऐसी दीवार खड़ी हो गई, जिसने आतंकवाद की बुराई को पहरावे और मज़हब विशेष से इस कदर जोड़ दिया की दाढ़ी और टोपी का मतलब आतंकवादी होना बन सा गया.

शुरुआत अयोध्या से करते हैं, क्योंकि यहां का विवाद और मामला पूरा सनातन है. कहते हैं, अयोध्या में राम का जन्म हुआ था, कहां- उसी जगह जहां बर्बर आक्रांता बाबर के किसी सेनापति ने मंदिर तोड़ कर मस्जिद का ढांचा बनाया. राम कौन थे- दशरथ नंदन, यानी अयोध्या के राजा, रघु के वंशज दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र, जो हिंदू मान्यता के हिसाब से भगवान विष्णु के 10  अवतारों में से एक, 7वें अवतार थे. जब राम का जन्म हुआ तब त्रेता युग था. हिंदू मान्यता कहती है, त्रेता युग 12,96,000, साल का था. इसके बाद आया द्वापर, जो 8,64,000 साल का था, और अभी चल रहा है, कलियुग- यानी मामला सालों, दशकों, शताब्दियों का नहीं, युगों पुराना है.

तो अगर राम-जन्म भूमि को हिंदू अस्मिता से जोड़ कर देख रहे लोगों की मानें, तो युगों- युगों के बदलाव और महाप्रलय के बाद भी ना तो अयोध्या बदली ना ही राम. उसी अयोध्या में, ठीक उसी जगह, जहां राम जी पैदा हुए थे, 2100 साल पहले सम्राट शकारि विक्रमादित्य द्वारा काले रंग के कसौटी पत्थर वाले 84 स्तंभों पर श्रीरामजन्मभूमि स्थित मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया.

1528 ईस्वी में मुस्लिम आक्रांता बाबर के सेनापति मीर बाकी ने भगवान श्रीराम का यह विशाल मंदिर ध्वस्त किया. इस्लामी आक्रमणकारियों से मंदिर को बचाने के लिए रामभक्तों ने 15 दिन तक लगातार संघर्ष किया, जिसके कारण आक्रांता मंदिर पर चढ़ाई न कर सके और अंत में मंदिर को तोपों से उड़ा दिया. हिंदू संगठनों का दावा है कि इस संघर्ष में 1,76,000 रामभक्तों ने मंदिर रक्षा हेतु अपने जीवन की आहुति दी.

दावा यह भी है कि ध्वस्त मंदिर के स्थान पर मंदिर के ही टूटे स्तंभों और अन्य सामग्री से आक्रांताओं ने मस्जिद जैसा एक ढांचा जबरन वहां खड़ा किया, लेकिन वे अजान के लिए मीनारें और वजू के लिए स्थान कभी नहीं बना सके.

हिंदू दावों की मानें तो 1528 से 1949 ईस्वी तक के कालखंड में रामजन्मभूमि स्थल पर मंदिर निर्माण हेतु 76 संघर्ष हुए. फिर 22 दिसंबर, 1949 की मध्यरात्रि में जन्मभूमि पर रामलला अचानक प्रकट हुए। वह स्थान ढांचे के बीच वाले गुम्बद के नीचे था। यह अचरज की बात है कि त्रेता के भगवान हज़ारों-लाखों वर्ष बाद जब मुस्लिम आक्रांता उनका मंदिर तोड़ रहे थे, तब तो लाखों लोगों की कुर्बानी के बाद भी चुप थे, पर जब सब कुछ शांत सा था, तब अचानक से एक जगह प्रकट हो गये, वह भी सोने-चांदी, हीरा-जवाहरात के देवता, या जीते-जागते मानस के रूप में नहीं, बल्कि पत्थर की मूरत के रूप में...

तब से, उसके बाद का विवाद आप सबको पता है.

राम-मंदिर का मसला आस्था से ज़्यादा राजनीति का हिस्सा है. भावनाओं का उभार अगर सकारात्मक दिशा में ना हो तो अकसर इनसान से उसका मूल छीन लेता है. आज अयोध्या मसले पर यही हो रहा है. यह तो अच्छा है कि देश की सबसे बड़ी अदालत ने अपने स्तर पर स्थगनादेश दे कर फिर से हिंदू-मुस्लिम के बीच में फैलती दरार को कुछ समय के लिए ही सही थामने की कोशिश की है. पर...

दूसरा मसला- दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका की उन 2 बिल्डिंगों से जुड़ा है, जिसे वर्ल्ड ट्रेड सेंटर कहते थे, और जो अपनी बनावट, आकार, भव्यता और उँचाई के चलते अमेरिका की पहचान बन गई थीं. ट्विन टॉवर नामक ये बिल्डिंगें 1966 में बननी शुरू हुईं और जुलाई 1973 में बन कर तैयार हुईं, जबकि 7 भवनों वाला पूरा वर्ल्ड ट्रेड टावर 1985 में बन कर तैयार हुआ. एक तरह से 110 माले की शान से सिर उठाई इन दो बिल्डिंगों का समूचा परिसर 5 और इमारतों से जुड़ा था. इन भवनों की लागत लगभग 2000 करोड़ रुपये के आसपास थी.

न्यूयार्क शहर के दिल में ये बिल्डिंगें इतने शान से खड़ी थीं कि इन्हें देखने रोज लगभग 80000 लोग पहुंच जाते थे. इन्हीं बिल्डिंगों पर 9/11 यानी 11 सितंबर 2001 को आतंक वादी संगठन अल- क़ायदा से जुड़े आतंकवादियों ने अमेरिका के ही 2 जेट विमानों 767 को टकरा दिया. जहाज़ों की इस टक्कर के ठीक 56 मिनट बाद दक्षिणी टावर गिर गया और उसके आधे घंटे के भीतर ही उत्तरी टावर भी ज़मीन पर था. ट्विन टावर की बाकी इमारतों को भी बाद में ढहा दिया गया, क्योंकि इस हमले से हुए नुकसान की मरम्मत नहीं कराई जा सकती थी.

अमेरिका ने अल-क़ायदा के इस हमले को अमेरिका के खिलाफ युद्ध करार दिया और अपनी सुरक्षा कड़ी करने के साथ ही अल-क़ायदा और उसके समर्थक देशों के खिलाफ जंग छेड़ने की बात कही. आज आतंकवाद से लड़ाई के नाम पर अमेरिका कहां-कहां क्या कर रहा है, कुछ छिपा नहीं है. इराक़, अफ़ग़ानिस्तान, लीबिया, तेहरान, मिस्र हर जगह उसका दखल है.

अमेरिकी सुरक्षा नियम, किसी भी इनसान की आज़ादी, गरिमा व सम्मान पर भारी हैं. चाहे वह भारत के पूर्व राष्ट्रपति, हमारे राजदूत, या फिर खुद रक्षामंत्री ही क्यों ना हों. आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका की लड़ाई हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के समाधि की गरिमा भी सुरक्षित नहीं रहने देती, और समाधि पर अमेरिकी प्रेसीडेंट के फूल चढ़ाने से पहले अमेरिकी कुत्ते, जिन्हें वे सिक्योरिटी अफ़सर कह कर बुलाते हैं, चक्कर लगाते हैं.

अगर सही शब्दों में कहें तो अमेरिका ने उन दो बिल्डिंगों के बदले 2 देशों का वजूद बदल दिया और लगभग दर्जन भर देशों की संप्रभुता ख़त्म कर दी. आलम यह है कि संभवत: रूस और चीन को छोड़ कर शायद ही कोई ऐसा देश हो जहां अमेरिकी सेनाओं को घुसने से कोई मनाही हो. कहीं दोस्ती के नाम पर, तो कहीं दबाव और भय के नाम पर.

... और अब जब अमेरिका का असली दुश्मन ओसामा बिन लादेन मार दिया गया है, तब क्या यह उम्मीद की जानी चाहिए की दुनिया को अमेरिकी सुरक्षा के नाम पर बंधक बनने से मुक्ति मिलेगी. अमेरिकी रूख़ से तो ऐसा नहीं लगता, क्योंकि उनकी पहचान विचारधाराओं से कम इमारतों की शोशे बाजी से है. क्या हम भारतीय उनसे अलग हैं?
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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