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भ्रष्टाचार! सवाल सरकार से पहले खुद से ?

जय प्रकाश पांडेय , Apr 08, 2011, 5:02 am IST
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भ्रष्टाचार! सवाल सरकार से पहले खुद से ?

आज देश के लगभग सभी बड़े अख़बारों का पहला पन्ना नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर भ्रष्टाचार के सवाल पर 4 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे 73 साल के गाँधीवादी अन्ना हज़ारे के अनशन पर नहीं, बल्कि टी20 के आईपीएल मैंचों की शुरुआत के विज्ञापनों से भरा पड़ा है। क्या है आईपीएल? कुछ धन कुबेरों द्वारा पैसा कमाने के लिए खरीदे गये बैट-बॉल से खेलने वाले कुछ युवाओं की टीम के बीच खेले जाने वाला एक मैच, जिसे अँगरेज़ों ने अपने शासनाधीन देशों में अँगरेज़ी के प्रभाव की तरह' क्रिकेट' का नाम देकर छोड़ दिया था।

कितने लोगों का भला होता है इस खेल से? आख़िर क्या है इस खेल में कि शराब बनाने-बेचने का कारोबार करने वाले विजय माल्या से लेकर हीरो शाहरूख ख़ान तक, मदारियों की तरह बोली लगाकर अपनी-अपनी टीमों पर दाव चलते हैं? कि जितना एक आम आदमी तो छोड़िए, बड़े से बड़ा कारोबारी भी जीवन भर फ़ैक्टरियाँ लगाकर, हज़ारों को रोज़गार देकर भी पूरे जीवन भर नहीं कमा पाता, उतने में एक टीम खरीदी जा रही है, कि उतने में तो एक खिलाड़ी भर नीलामी में मोल लिया जाता है। क्या यह तमाशा देश के भले के लिए हो रहा है? क्या इससे किसी एक के भी पेट में जल रही भूख की आग शांत होती है, हो सकती है?

किसी ने कहा था मुझसे कि क्रिकेट इस देश की रगों में खून की तरह दौड़ता है! क्या वाकई? अगर यह सच है तो फिर अख़बार, टेलीविज़न और रेडियो पर विज्ञापन देने और खेल के मैदान में अधनंगी गोरी चिट्टी लड़कियों को 'चीयर लीडर्स ' कह कर हर चौके-छक्के पर नचाने की क्या ज़रूरत है? बड़ों और विदेशों के चोंचले भरे पेट ही भाते हैं, खाली पेट को तो बस रोटी दिखती है।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम कर रहे मेरे एक मित्र ने कहा, अन्ना केवल मीडिया, ख़ासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की देन हैं, अभी कहीं सुनामी आ जाए, या बम फट जाए, तो अन्ना के आंदोलन की हवा निकल जाएगी। हो सकता है उनका आकलन सही हो, पर क्या केवल इतने भर से अन्ना ने जिन विषयों को उठाया है, उनकी अहमियत कम हो जाती है? आज हम उस समाज का हिस्सा बन चुके हैं, जहाँ हर कोई केवल खुद के लिए जी रहा है, और सड़क पर चलने वाले राहगीर, या खोमचे वाले से लेकर बड़े से बड़ा, नेता, समाज सेवी भी रुपया बनाने में लगा है, पैसे के आगे-पीछे किसी को कुछ नहीं सूझता, न नाता, ना रिश्ता।

उसी समाज में बिना बुलावा दिए, बिना बड़े-बड़े वादों और विज्ञापनों के, यह जानते-बुझते हुए भी कि अन्ना के धरने पर पहुँच कर या देश के अलग-अलग कोने में उनके समर्थन में जलसा, जुलूस व धरना-प्रदर्शन व रैलियाँ करने से उन्हें निजी तौर पर तत्काल कुछ खास हासिल नहीं होगा, फिर भी लोग जुटे हैं, तो क्या यह अन्ना, उनके द्वारा उठाए गये सवालों की कम बड़ी सफलता है।

यह तो बात हुई जन-जागरण के मोर्चे पर मिली सफलता की, अब ज़रा दूसरा पहलू देखें, अगर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इतना ही बारहा होता, तो याद करिए भ्रष्टाचार से जुड़ा आज के दौर का सबसे बड़ा ‘2 जी स्पेक्ट्रम मामला’ जिसमें ए.ऱाज़ा और दूसरों की भूमिका पर संयुक्त संसदीय समिति की माँग को लेकर समूचे विपक्ष और मीडिया के पूरी ताक़त लगा देने और लगभग पूरा शीत-सत्र भेंट चढ़ जाने के बावजूद भी इसी सरकार के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी थी। वही सरकार अन्ना के आमरण अनशन पर बैठने के पहले दिन से बेचैन है, तो कुछ तो बात होगी। बंदे में था दम, नहीं- बंदे में है दम, वंदे मातरम्...

अन्ना की ताक़त क्या है? एक आदमी, उम्र 73 साल, सेना की नौकरी से समय से पहले सेवा-अवकाश लेकर अपने गांव में बसे और आस-पास के लोगों की मदद करनी शुरू की, धीरे -धीरे लगा भ्रष्ट नौकरशाह और राजनीतीबाज ही इस देश की बरबादी की जड़ में हैं इसलिए, जहाँ भी जब भी मौका लगा, मोरचा खोला। बदले में 2 बार पदम पुरस्कार और आम जनता के बीच ढेर सारा सम्मान और शोहरत मिली। अब तक के जीवन में इतना मिल गया था कि अगर दिल्ली की उमस भरी चिलचिलाती गरमी में केवल पानी के भरोसे आमरण-अनशन पर ना भी बैठते ,तो भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता। इसी तरह , अगर जन-लोकपाल बिल की उनकी माँग मान ली जाती है, तब भी उन्हें निजी तौर पर कुछ बड़ा, विशेष हासिल हो गया, या हो जाएगा, ऐसा नहीं है।

सवाल क्रिकेट, भूख, भ्रष्टाचार और अन्ना के बीच किसी एक को चुनने या छोड़ने का नहीं है, बल्कि अन्ना के बहाने उन विषयों पर सोचने का है, जिनसे हम बाख़बर होते हुए भी, बेख़बर थे। हमारे आज के जीवन में भ्रष्टाचार का घुन क्यों लगा है, इसलिए की पैसा ही सबसे बड़ी चीज़ के तौर पर उभरा है। 'बाप बड़ा ना भईया, सबसे बड़ा रुपैया' हमारे प्रजातांत्रिक मूल्यों ने जाति, धर्म, क्षेत्र, पद की श्रेष्ठता ख़त्म कर दी और पैसों की सुप्रीमेसी का रोग लगा दिया। दो अफ़सर हैं, एक बराबर की पोस्ट पर हैं, एक ने घुस से, चोरी- चकारी कर घर बनवा लिए, गाड़ियाँ खरीद ली, तो लोग उसकी मिसाल देने लगते हैं, जब की दूसरे ने ईमानदारी से नौकरी की, जितना हो सका अपने दायित्व का निर्वाह किया, तो लोग उसे बेवकूफ़ समझते हैं। पैसा नहीं है, तो इंसान बेचारा है! योग्यता, रिश्ता, भाईचारा सब गायब।

ज़रूरत इस मानसिकता को बदलने की है, जिस भी दिन पैसे को प्रतिष्ठा का नहीं, केवल जीवन की ज़रूरत भर का माध्यम मान लिया जाएगा, भ्रष्टाचार की बीमारी अपने-आप ख़त्म होने लगेगी। चोर-उचक्के नेताओं, अफ़सरों को गैर क़ानूनी ढंग से पैसे कमाने पर सम्मान के बदले अपमान और हिकारत मिलने लगे तो, फिर किसी जन-लोकपाल की ज़रूरत ही ना होगी। मेरे एक बेहद ईमानदार पुलिस अफ़सर मित्र ने कभी कहा था, सरकार इतनी तनख़्वाह व सम्मान देती है कि कोई भी सरकारी नौकर घुस ना ले तो भी, सम्मान से जी लेगा...आख़िर उनके जैसे लोग भी तो जीते ही हैं।

अन्ना के आंदोलन की सफलता और उनका साथ तभी है,  भ्रष्टाचार का शिकार, या भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ने वाला, उसे समर्थन देने वाला हर आदमी खुद से शुरुआत करे।

क्रिकेट प्रेमियों, माफ़ करना, मेरी आप से कोई अदावत नहीं, पर जीवन हमेशा खेल से बड़ा मसला होता है दोस्त। सो फिलहाल अगर भूल नहीं रहा ,तो धरमवीर भारती के शब्दों में इतना ही:
समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध।
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।।

जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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