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धर्म-अध्यात्म
मानस मीमांसाः निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहिं कपट छल छिद्र न भावा दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 11, 2017
एक तो ज्ञान का, पुरुषार्थ का मार्ग है, जिससे हम बुद्धि को निर्मल बनायें। पर तुलसीदासजी तो नन्हें बालक की तरह हैं। वे मानते हैं कि अगर बड़ा बालक हो, तो उसे अपनी गन्दगी तो धोना ही पड़ेगा, क्योंकि ब्यक्ति तो मल का ही बना है- गंदगी दूर करने के लिए पहले कपड़े को साबुन से धोएँ और बाद में स्वच्छ जल से कपड़े में लगे साबुन को धोएँ। इसी तरह से साधना और सत्कर्म से मलिनता को धोने के उपरान्त फिर साधन को भी धो डालिए। और वह भी शुद्ध जल से । ....  लेख पढ़ें
मानस मीमांसाः अस संजोग ईस जब करई, तबहुँ कदाचित सो निरुअरई दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 09, 2017
विचार तो मथानी है। मथानी चलाइए, यह तो बिल्कुल ठीक है, लेकिन यह तो देख लीजिए कि आप मथानी चला कहाँ रहे हैं? आप पानी में मथानी चलाते रहिए,दिन रात परिश्रम करते रहिए तो भी उस पानी से मक्खन निकलेगा क्या? इसलिए अंतःकरण में यदि केवल पानी भरा हो, तो फिर विचार मंथन से क्या निकलेगा। और अगर वह पानी गंदा हो तो मंथन से उभर कर गंदगी ही तो ऊपर आयेगी। ....  लेख पढ़ें
मानस मीमांसा, सुंदर कांडः तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहु नहिं विश्राम दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 08, 2017
तथ्य तो यह है कि जीव सबसे बड़ा है पर जीवन की सच्चाई में ऐसा दिखाई दे रहा है कि जीव जो है अपने शरीर के साथ, अपनी इन्द्रियों के साथ विषयों का गुलाम हो गया है। ऐसा षड़यंत्र विचित्र हो गया कि जो स्वामी था, वह बेचारा सेवक हो गया है। और बेचारा निरंतर दुःख अनुभव कर रहा है, वासना और अतृप्ति का अनुभव कर रहा है। जीव के अंतःकरण में फिर मोह, अहंकार आदि की प्रबृत्तियाँ आ जाती हैं। ....  लेख पढ़ें
मानस मीमांसा: पुनि रघुबीरहिं भगति पियारी, माया खलु नर्त्तकी बिचारी दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 07, 2017
अंतःकरण में संसारिक "भय” के संस्कार इतने प्रबल होते हैं कि उनसे ऊपर उठकर भगवान तक जाना, जीव के लिए संभव नहीं। किन्तु भगवान, रुष्ट नहीं हो जाते हैं। अपितु उन्होंने अनुभव किया कि, मुझे उनको अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए भय के उन निमित्त कारणों को भी समाप्त करना होगा, जो जीव और ईश्वर के बीच ब्यवधान बने हुए हैं। ....  लेख पढ़ें
मानस मीमांसा: कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं, चारु चरित नाना बिधि करहीं दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 06, 2017
भगवान शिव में परम तत्त्वज्ञ के रूप में ब्रह्म के निर्गुण-निराकार स्वरूप का बोध है। अचानक उनके अंतःकरण में एक संकल्प जाग्रत हुआ--”कितना अच्छा हो कि यह निर्गुण निराकार ब्रह्म, सगुण साकार बनकर विश्व में अवतरित हो और ऐसा चरित्र प्रस्तुत करे जो लोक-मंगल के लिए आदर्श बन जाए!! ”वह आदर्श लीला कौन सी हो सकती है,इसकी एक रूप-रेखा उनके अन्तर्मन में बनी। यह स्फुरणा ही राम-चरित्र का मूलसूत्र बन गयी। ....  लेख पढ़ें
मानस मीमांसा- कहु खगेस अस कवन अभागी, खरी सेव सुरधेनुहिं त्यागी दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 05, 2017
ऐसा कौन अभागा ब्यक्ति होगा जो कामधेनु को छोड़कर गधी का सेवन करे? इसका अभिप्राय यह है कि उन्होंने विद्या के दो रूप दिए। इसमें एक विद्या तो कामधेनु की तरह है तथा दूसरी गधी की तरह। गधे पर अगर चंदन की लकड़ी लाद दिया जाय तो ढो देगा और कूड़ा-कर्कट लाद दिया जाय तो वह भी ढो देगा। ....  लेख पढ़ें
नित्य मानस चर्चाः अथ रुद्राष्टकम्- प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 04, 2017
अभिशाप एक बरदान बन जाता है, जब जन्म-मृत्यु, दुख-बिहीन हो जायेंगे, और विगत जीवन का ज्ञान बना रहेगा तो हमें उत्तरोत्तर ऊँची-स्थिति प्राप्त करने का मार्ग स्वतः स्पष्ट होता जायेगा और इसी का लाभ भुशुंडिजी को आगे मिला भी, जब महर्षि लोमस ने उन्हें काक बनने का श्राप दिया तो उनका कंपन नहीं दिखा, जैसा कि भगवान शिव के शाप के समय उत्पन्न होकर गुरुदेव को हाहाकार करने के लिए उद्यत किया था ....  लेख पढ़ें
नित्य मानस चर्चाः अथ रुद्राष्टकम्- प्रसीद प्रभो सर्व भूताधिवासं दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 03, 2017
दर्शन एवं शास्त्रावलोकन करना, कानों से गुणानुवादादि सुनना, तथा हाथों से उनके विग्रह की पूजा करना और सब में भगवद्बुद्धि करके सबकी सेवा करना तथा श्रीहरि की आज्ञाओं का पालन करना, इत्यादि 'इन्द्रियों' से उनके शरण होना है। और उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम करना आदि 'शरीर' से भगवान की शरण होना है। ....  लेख पढ़ें
नित्य मानस चर्चाः अथ रुद्राष्टकम्- कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 02, 2017
श्रीकृष्ण,चंद्रवंश से संबंधित हैं।चन्द्रमा में सोलह कलायें होती हैं, जबकि श्रीराम, सूर्यवंश में उत्पन्न हुए हैं,तथा सूर्यनारायण की पूजा "द्वादशादित्य”के रूप में की जाती है। इसी कारण भगवान राम को बारह कला की उपाधि दी गयी है। निराकार ब्रह्म के संबंध में कला के आधार पर विवाद संभावित होता है,अतः भगवान शिव की स्तुति कलातीत के रूप में सूग्राह्य है। ....  लेख पढ़ें
मानस मीमांसाः अथ रुद्राष्टकम्- चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 01, 2017
गोस्वामीजी ने इस स्तुति को "रुद्राष्टक”की संज्ञा दी,”शिवाष्टक” नहीं लिखा, क्योंकि रुद्र शब्द उग्रता/ क्रोध का प्रतीक है, जिसका अर्थ होता है- "रुलाने वाला”। अतः गुरुदेव की स्तुति भगवान को उनके "शिवत्त्व-स्वरूप” में लाने के लिए थी, ताकि उनके शिष्य पर नित्य-प्रसन्न- शिव ,कल्याण-दृष्टि डालें। भगवान शिव तो सभी देवताओं से पहले प्रसन्न होने वाले देवाधिदेव हैं- ....  लेख पढ़ें
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